Tuesday, February 3, 2015

अस्तित्व या व्यक्तित्व

                                अस्तित्व या व्यक्तित्व 

मैं, मैं क्या हूँ.
अस्तित्व हूँ या व्यक्तित्व 
नजर हूँ या पर्दा
लाज हूँ या इज्जत
शर्म हूँ या गर्व
जब जानने की ये चेष्टा की मैंने, तो बतलाया गया मुझे कि तुम? तुम एक औरत हो बस औरत.
क्या मानती मैं इस शब्द को? 
क्या परिभाषा देती मैं इसे?
मैं तोह एक औरत हूँ जो लड़ रही हैं अस्तित्व और व्यक्तित्व की लड़ाई.
मर रही हैं पल पल, कि अस्तित्व बचाऊ या व्यक्तित्व.
किसके हनन से ज्यादा हानि होगी.
बहुत विचार करने के बाद फैसला लिया कि व्यक्तित्व का हनन तोह न जाने कब से हो रहा हैं. पर अब जो अस्तित्व के लिए लड़ रही हूँ, उसको कभी न छोडूंगी. न जाने कितनी मेहनत के बाद अस्तित्व  बचाने का बीड़ा उठा पाई हूँ, नहीं तोह अभी तक बस इसे सब रोंदते चले आ रहे थे. और रही बात व्यक्तित्व की, वह आज हैं कल नहीं. अस्तित्व के सहारे ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है. और वैसे भी औरतों के लिए कभी कोई सफ़र आसन नहीं रहा, उन्हें हमेशा चुनाव करना पड़ता हैं. जिन्दगी के हर कदम पर कभी पिता कभी भाई कभी पति और कभी बच्चों के बीच चुनाव. जहाँ हमेशा औरतों ने समझोते किये हैं. अपने अस्तित्व से ज्यादा उन्हें औरो की परवाह रही. बस एक चीज अच्छी हुई की इस चुनाव के दौर से निकलते हुए और वह यह कि अब औरत ने अपने अस्तित्व को चुना है. और वह लड़ भी रही है. बहुत अच्छा लगता हैं यह देखके की अब औरत  बेचारी वाली प्रवत्ति से उठ रही हैं. और वह लड़ रही है.. और विश्वास हैं की एक न एक दिन वह अपने अस्तित्व की लड़ाई जरुर जीतेंगी.

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