Monday, January 11, 2016

एक सच्चे दिल की तलाश है

एक सच्चे दिल की तलाश है,
है मुख़्तसर लेकिन खास है.
बूंद बूंद से जैसे घड़ा भरता है,
पल पल दिल उसी तरह मचलता है.
न जगजाहिर है न राज है,
एक सच्चे दिल की तलाश है.
ऊंचे पर्वत लम्बा रास्ता,
घना अँधेरा और भी बड़ा.
एक सुनहरे सवेरे की आस है,
एक सच्चे दिल की तलाश है.
दुनिया बहुत फरेवी है,
न तेरी न मेरी है है.
बस मरती मिटती लाश है,
एक सच्चे दिल की तलाश है.
रिश्तों की गांठ की गठरी में,
सब बंधे है एक पटरी में.
न रुक सकती न चलने को राज़ी ये सांस है
एक सच्चे दिल की तलाश है.
ऊपर मन में सब खुश है,
अन्दर की न जाने कोई.
क्यों फिर भी ये उल्लास है,
एक सच्चे दिल की तलाश है.
है मुख़्तसर लेकिन खास है....
       
             सोनम राठौर 

Thursday, October 15, 2015

काश!

                                                काश!

बचपन की यादें धुंधली और अधूरी होती है,
कितना भी याद कर  लो तब भी पूरी नहीं होती है.
याद मुझे भी है बचपन के धुंधलेपन  की,
मम्मी का चिल्लाना और पापा के अपनेपन की.
समय ने फिर उल्टा फेर मारा,
पापा चिल्लाने लगे मम्मी ने घर संभाला.
क्या ये थी उनकी सोच या समाज का दबाव,
कि बेटियों को भैया कम ही पढ़ाओ.
जब लड़कों की असफलता और लड़कियों की सफलता उन्हें चुभने लगी,
ये क्या है, क्यों है, ये सोचकर मैं डरने लगी.
अब तो मुझे ये फासला मिटाना है,
अपने पापा की बेटी नहीं बेटा बनके दिखाना हैं.
सपना बड़ा जरूर हैं, पूरा करने की जिद भी भरपूर है.
लेकिन......
काश पापा समझ पाते, उनकी कमी को बस अपने होने से भर पाते,
बेटे तो उनके हैं ही, अपनी बेटी को भी बेटी समझ पाते.

Friday, October 9, 2015

छुपाओ नहीं बताओ

जब मुझे पहली मासिक धर्म हुए, तो मैं डर गई,

लेकिन जब डॉ. आंटी ने इसके कारण और जरूरत को समझाया तो थोड़ी संतुष्टि सी हुई.

लेकिन इन चार दिनों की झंझट मुझसे न संभाली गई,

न चाहते हुए भी मेरे चेहरे पर झुंझुलाहत आ गई.

मेरे चेहरे पर परेशानी देखकर मेरे दोस्त ने मुझसे पूछा- छुटकी तुझे क्या हुआ है.

तेरे चेहरे का तो रंग ही उड़ा हुआ है

बहुत मना करने के बाद जब मैंने उसे अपनी हालत बताई.

वो तो स्तब्ध हो गया, बोला ये कैसी परेशानी है जो सिर्फ तुम्हे ही आई.

ये परेशानी मेरी नहीं बल्कि उन सब लड़कियों की है जो मेरी उम्र में आती हैं.

रक्तपात, दर्द, कमजोरी वो सहन नही कर पाती है.

सुनकर ये बातें गोलू दौड़ा अपने घर जाकर बोला अपनी माँ से

माँ! क्या तुम भी उस दर्द से गुजरती हो, जिससे छुटकी गुजर रही है.

माँ बोली क्या?

अरे वही मासिक धर्म!!!

सुनकर ये बात वो दौड़ी मेरे घर को, बोली तनिक भी लज्जा और शर्म नहीं है तुमको.

काकी, इसमें लज्जा और शर्म की क्या बात है.

ये तो हम और आपके लिए आम बात है.

माहवारी शाप नहीं, महिला शरीर की आवश्यकता हैं.

इसे छुपाने में क्या बुद्धिमत्ता हैं.

अरे बेशर्म, इन सब बातों को अपने तक ही रखा जाता है.

इन्हें ऐसे किसी पुरुष को नहीं बताया जाता है.

ये बात तुम्हारे भी अपमान की है,

इसको ऐसे बताना हानि तुम्हारे मान सम्मान की है.

काकी, ये तो एक प्राकृतिक प्रक्रिया है,

जो हर औरत के जीवन की एक क्रिया है.

वैसे भी डॉ. आंटी ने कहा है कि-

अब इसे 'छुपाओ नही बताओ'....

Wednesday, October 7, 2015

अब बस करो

ये सुनना कितना दहशत भरा लगता हैं कि इंसानियत ने या ये कहे हैवानियत ने क्या रूख ले लिया है. ये कौन लोग हैं जो न जाने किस युग में जी रहे है. उन्हें क्या लगता हैं की ऐसा करना काबिले-तारीफ हैं. क्या इससे वो अपनी धार्मिक भावनाओं का उजागर कर रहे हैं या वो इतने संजीदा हैं अपनी धार्मिक निष्ठा को लेकर की कोई कैसे इसका मजाक उदा सकता हैं.. क्या वाकई???? जो कुछ पिछले दिनों दादरी में हुआ वो एक ऐसी शर्मनाक हत्या थी जिसको धर्म-जाति से जोड़ दिया गया. गायों की स्थिति अब वैसी नहीं रही जैसी की 'प्रेमचन्द' जी ने अपनी किताब 'गोदान' में दर्शायी थी, कि एक व्यक्ति कैसे निरंतर सोचता रहता है की काश कोई गाय उसके दरवाजें को सुशोभित करे, वो उसकी सेवा कर सके. उसका दूध दही उसके परिवार के स्वास्थ्य को बड़ायेंगा. अब तो न जाने कितनी गाय सड़कों पर लोगो की गलियाँ खाती घूम रही हैं. उनका कोई देखने वाला नहीं है. मैं ये नहीं कह रही की अगर गाय फालतू है तो उन्हें दूसरो की थाली में परोस दो. गाय हमारी संस्कृति से आज से नहीं न जाने कबसे जुडी हुई हैं. ग्रंथो में गाय के मूत्र तक को पवित्र कहा गया हैं. फिर ये स्थिति कब उत्पन्न हुई की गाय ऐसे रास्ते में दर दर भटकने पर मजबूर हो गई. जितने लोगों ने मिलकर उस एक व्यक्ति को मारा है अगर वो सब एक एक गाय को भी अपने घर रख ले, तो गायों की इस दयनीय स्थिति में कुछ तो सुधार हो. हर बात को धर्म से जोड़ना बेकार हैं. क्योंकि ऐसे बहुत से दलित है और ऐसे दूसरे लोग जो गाय का मांस खाते है. बस किसी का मुस्लिम होना इस बात का प्रमाण नहीं की वो दोषी हैं. और इन सबसे ऊपर ज्यादा धर्म संस्कृति का ठेका लेने वाले लोग अब तो तुम लग ही जाओ गाय पालन के लिए.. कम से कम तुम्हारी मांशिक स्थिति में न सही किन्तु तुम्हारे स्वास्थ्य में सुधार जरूर आ जायेगा.

Monday, September 7, 2015

लाइफ इन अ मेट्रो

लाइफ इन अ मेट्रो.......

कहते है की नया शहर आपके लिए न जाने कितनी नयी चीजें लेकर आता है... नयी जगह, नया माहौल, नये लोग, बगैरह बगैरह... मेरे लिए भी ये नया शहर कुछ एक टेंशन और बहुत सारी ख्वाहिशें लेकर आया हैं. ख्वाहिशें!!! आज़ादी से जीने की, अपने पैरों पर खड़े होने की. पहला दिन तो ठीक था लेकिन उसके बाद जब मैंने पहला कदम अकेले बाहर निकाला तो it’s quite interesting but lot’s of tension... वैसे एक बात तो हैं मेट्रो सिटीज के बारे में, आप यहाँ खो नहीं सकते. रास्ता तो मिल ही जाता हैं. और फिर ये आप पर निर्भर करता है की आप खोने में विश्वास रखते हैं या रास्ता ढूढने में. मेरे साथ पहले ही दिन ऐसी बहुत सी चीजे हुई जिससे मैं कन्फर्म हो गई, कि बिट्टा ये शहर तुम्हारे लिए परफेक्ट हैं. मैं तो परेशान हो गई थी सबकी नजरों से घर पर. और यहाँ किसी को किसी से मतलब ही नही हैं, लेकिन इसका ये भी मतलब नहीं है कि आपकी कोई मदद भी नही करेगा. आप एक से बोलिए चार होंगे. specially यूथ उनके लिए छोटा बड़ा कोई फर्क नही. कहते हैं कि लड़कियों के लिए बड़े शहर सेफ नही है. गलत.... इससे ज्यादा सेफ कोई और जगह नहीं होगी. जितनी आत्मनिर्भर यहाँ की लड़कियां हैं अगर उतनी पूरे भारत की ५% ही हो जाये तो फिर स्थिति ही बदल जाये. सुन्दर दिखना, कैसे कपड़े पहनना वो सब इन चीजों से ऊपर उठ गई हैं. उनकी सुन्दरता उनकी आत्मनिर्भरता से छलकती हैं, फिर उन्होंने जो भी ऊपरी लिबास डाला हो. मैं बहुत खुश हूँ कि आज मैं यहां का हिस्सा हूं. बस ये शहर मुझे भी धीरे धीरे अपना ले फिर सब सेट हैं..... 

Monday, April 20, 2015

बस चाह है मुझे.....

इस खुले उन्मुक्त गगन में, उड़ने की चाह है मुझे.
अपने पंखो के सहारे, सपने साकार करने की चाह है मुझे.
चढ़कर सारी ऊचाइयां, एक आशियाना बनाने की चाह है मुझे.
अवला नही सबला हूँ मैं, बन्धनों की नहीं कारवां की चाह है मुझे.
बड़ों का आशीष लेकर, स्वयं को आजमाने की चाह है मुझे. 
मूक नहीं सशक्त हूँ मैं, आवाज उठाने की चाह है मुझे.
माँ बेटी बीवी के किरदारों के साथ ही, खुद का अस्तित्व बनाने की चाह है मुझे.
चुनरी से आँचल तो बना लिया, बस अब परचम लहराने की चाह है मुझे.


Sunday, April 5, 2015

दामिनी यादव

दामनी यादव-
'' आज मेरी माहवारी का 
दूसरा दिन है। 
पैरों में चलने की ताकत नहीं है,
जांघों में जैसे पत्थर की सिल भरी है। 
पेट की अंतड़ियां
दर्द से खिंची हुई हैं।
इस दर्द से उठती रूलाई
जबड़ों की सखती में भिंची हुई है।
कल जब मैं उस दुकान में
‘व्हीस्पर’ पैड का नाम ले फुसफुसाई थी,
सारे लोगों की जमी हुई नजरों के बीच,
दुकानदार ने काली थैली में लपेट
मुझे ‘वो’ चीज लगभग छिपाते हुए पकड़ाई थी।
आज तो पूरा बदन ही
दर्द से ऐंठा जाता है।
ऑफिस में कुर्सी पर देर तलक भी
बैठा नहीं जाता है।
क्या करूं कि हर महीने के
इस पांच दिवसीय झंझट में,
छुट्टी ले के भी तो
लेटा नहीं जाता है।
मेरा सहयोगी कनखियों से मुझे देख,
बार-बार मुस्कुराता है,
बात करता है दूसरों से,
पर घुमा-फिरा के मुझे ही
निशाना बनाता है।
मैं अपने काम में दक्ष हूं।
पर कल से दर्द की वजह से पस्त हूं।
अचानक मेरा बॉस मुझे केबिन में बुलवाता हैै,
कल के अधूरे काम पर डांट पिलाता है।
काम में चुस्ती बरतने का
देते हुए सुझाव,
मेरे पच्चीस दिनों का लगातार
ओवरटाइम भूल जाता है।
अचानक उसकी निगाह,
मेरे चेहरे के पीलेपन, थकान
और शरीर की सुस्ती-कमजोरी पर जाती है,
और मेरी स्थिति शायद उसे
व्हीसपर के देखे किसी ऐड की याद दिलाती है।
अपने स्वर की सख्ती को अस्सी प्रतिशत दबाकर,
कहता है, ‘‘काम को कर लेना,
दो-चार दिन में दिल लगाकर।’’
केबिन के बाहर जाते
मेरे मन में तेजी से असहजता की
एक लहर उमड़ आई थी।
नहीं, यह चिंता नहीं थी
पीछे कुर्ते पर कोई ‘धब्बा’
उभर आने की।
यहां राहत थी
अस्सी रुपये में खरीदे आठ पैड से
‘हैव ए हैप्पी पीरियड’ जुटाने की।
मैं असहज थी क्योंकि
मेरी पीठ पर अब तक, उसकी निगाहें गढ़ी थीं,
और कानों में हल्की-सी
खिलखिलाहट पड़ी थी
‘‘इन औरतों का बराबरी का
झंडा नहीं झुकता है
जबकि हर महीने
अपना शरीर ही नहीं संभलता है।
शुक्र है हम मर्द इनके
ये ‘नाज-नखरे’ सह लेते हैं
और हंसकर इन औरतों को
बराबरी करने के मौके देते हैं।’’
ओ पुरुषो!
मैं क्या करूं
तुम्हारी इस सोच पर,
कैसे हैरानी ना जताऊं?
और ना ही समझ पाती हूं
कि कैसे तुम्हें समझाऊं!
मैं आज जो रक्त-मांस
सेनेटरी नैपकिन या नालियों में बहाती हूं,
उसी मांस-लोथड़े से कभी वक्त आने पर,
तुम्हारे वजूद के लिए,
‘कच्चा माल’ जुटाती हूं।
और इसी माहवारी के दर्द से
मैं वो अभ्यास पाती हूं ,
जब अपनी जान पर खेल
तुम्हें दुनिया में लाती हूं।
इसलिए अरे ओ मर्दो!
ना हंसो मुझ पर कि जब मैं
इस दर्द से छटपटाती हूं ,
क्योंकि इसी माहवारी की बदौलत मैं तुम्हें
‘ ‘ भ्रूण’ से इंसान बनाती हूं।