Friday, June 28, 2019

मुझे नफरत है #Hate

मुझे नफरत है, हर चीज में जाति धर्म लाने से
मुझे नफरत है हर चीज को रंगों से जोड़ने से
मुझे नफरत है दूसरों का हक़ छीनने से
मुझे नफरत है किसानों के बेवजह मरने से
मुझे नफरत है नदियों का गलत दोहन करने से
मुझे नफरत है बेरोजगारी के बढ़ने से
मुझे नफरत है बेबुनियादी जुमले गढ़ने से
मुझे नफरत है लोगों के जज़्बातों से खेलने से
मुझे नफरत है इंसान को भगवान समझने से
मुझे नफरत है दूसरों पर आश्रित रहने से
मुझे नफरत है मुफ्त का खाने से
मुझे नफरत है भ्रष्टाचार बढ़ाने से
और मुझे नफरत है नफ़रत को और बढ़ाने से

You can never tell a Book by its Cover

Lester Fuller and Edwin Rolfe (उच्चारण गलत न हो इसलिए ऐसे लिखा) द्वारा कही गई ये कहावत सभी संदर्भों में सटीक बैठती है। इसका मतलब है कि किसी भी किताब को उसका कवर देखकर यह निर्धारित नहीं करना चाहिए कि ये अच्छी ही है, जबतक कि उसे पढ़ न ले। यही बात हमारे जीवन की हर चीज पर लागू होती है। जैसे कि ब्रम्हाण है तो शाकाहारी होगा, बिहारी है तो चालाक होगा, मुस्लिम है तो आतंकवादी होगा वगैरह वगैरह। ये बिना जाने पहचाने, बिना बात किए, बस किसी के कहने पर मान लेना वाली प्रवत्ति हम में कूट कूट कर भरी है। शायद इसी वजह से बहुत आसानी से हम भ्रमित हो जाते है। वैसे मेरे ये लेख लिखने का उद्देश्य आपकी भ्रमित प्रवत्ति को सही रास्ते पर पर लाना नही है, मैं यहाँ बस अपना एक अनुभव साझा कर रही हूँ, जिससे मेरा ये भ्रम हाल ही में टूट गया। शायद आप लोगों ने सुना हो या न लेकिन मैंने बहुत सुना है अपने दोस्तों से कि पहाड़ी लोग बहुत बफादार, और मदद करने वाले होते है। लेकिन अभी तक लगभग 4 पहाड़ी जगहों का भ्रमण करके मैंने ये जाना है और जैसे कि ये सार्वभौमिक सत्य भी है कि हर जगह हर तरह के लोग होते है आप उन्हे उनके पहाड़ी, उनके बिहारी या उनके काले, गोरे होने से जज नहीं कर सकते।

अभी हाल में मैं मेकलोडगंज (हिमाचल प्रदेश) घूमने के लिए गई, वहाँ पहले दिन घूमने की वजह से होटल आने में देरी हो गई, जिसकी वजह से होटल में हमें खाना नही मिल सका, जब हमने खाने के लिए मदद मांगी तो होटल में कोई ऐसा नही था जो हमारी मदद के लिए आगे आए, तब मैंने सोचा क्या सच में पहाड़ी लोग मददगार होते? फिर जब हम खुद बाहर खाना लेने के लिए निकले तो रास्ता न पता होने पर हमने एक लड़के से रास्ता पूछा और साथ ही कि यहाँ खाना कहा मिल सकता है, उस लड़के ने तुरंत फोन निकाल कर उसके किसी दोस्त को फोन किया उससे किसी होटल का नंबर मांगा और हमे दिया और कहा यहाँ से आप ऑर्डर कर दीजिये आपको यही देने आ जाएगा, फिर तो मुझे अपनी सोच पर संदेह हुआ, और मेरा विश्वास जाग गया। दूसरे दिन जब हम घूमने निकले तो मेरी सहेली जल्दबाज़ी में अपना फोन और चश्मा एटीएम पर ही छोड़ आई, फोन का खो जाने का दर्द मुझसे बेहतर कोई नही जान सकता, मेरे तीन फोन खोये है या कह ले चोरी हुये है। तो अब फोन का चला जाना मतलब उसके आने की कोई उम्मीद नही। फिर भी हमने सोचा चलो एक बार कॉल कर लिया जाए तो कॉल करने पर वहाँ से एक पुलिस वाले ने फोन उठाकर कहा कि आप फला जगह आकर फोन ले ले। हमे फोन और चश्मा दोनों मिल गया। फोन किसी ने एटीएम मशीन से उठाकर बगल के पुलिस स्टेशन में जमा कर दिया था। जहां एक ओर चोर पुलिस के साथ मिलकर चोरियाँ करती है वहाँ ईमानदारी का ये अच्छा उदाहरण है। अब तो मेरा विश्वास और मजबूत हो गया। फिर जब वापिसी के लिए हमने टैक्सी की तो उसने 600 रूपय बताए, हम मान गए क्योंकि हमे जल्दी भी थी और रास्ता दूर भी था। लेकिन वो टैक्सी वाले भैया (यूपी में हम भैया ही कहते है) ने न जाने कौन सा शॉर्ट कट लिया और 10 मिनट से भी कम समय में हमे हमारी मंजिल पहुचा दिया, मन ही मन इतना ठगा हुआ महसूस किया। विश्वास थोड़ा डगमगाया लेकिन सार यही निकला कि भाई हर जगह हर तरह के लोग होते है, और शायद तभी दुनिया चल रही है।

Monday, January 28, 2019

बहुत अंतर है

बहुत अंतर है कल के आज के और कल के भारत में
कल जब हम साथ बैठते थे, तो बातें होती थी आपस की, कुछ हमारी कुछ आपकी।
आज के दौर में हम बैठते जरूर हैं लेकिन जिद होती है खुद की सुनाने की, अब कल का दौर और ही होगा जब बैठके होंगी सिर्फ दिखावे की।

कल जब हमारी किसी से लड़ाई होती थी, तो आ जाते थे आसपास के लोग, झगड़ा सुलझाने को
आज लड़ाइयाँ कराई ही जाती है आसपास के लोगों के द्वारा
फिर एक कल होगा, जब परवाह नहीं होगी किसी को किसी के मरने की।

कल जहां लड़ाइयों के मुद्दे थे शिक्षा, आज़ादी, बेरोजगारी
वही आज हम मंदिर मस्जिद में ही सिमटे हुये हैं
और एक कल होगा जब लड़ाई ही मुद्दा होगा।

कल त्योहारों में एक मिठास थी अपनेपन की
आज वो कड़वाहट में बदल गई और एक कल होगा जब किस्से सुने जाएंगे किसी सोशल मीडिया प्लैटफ़ार्म पर कि, एक था त्योहार होली का।

कल जहां सब दोस्त थे, किसी अनजाने को भी हम अपना बनाकर शरण देते थे,
आज दोस्त ही अजनबी हो गए है, ईर्ष्या द्वेष ने सबको अलग कर दिया है
और एक कल होगा, जब दोस्ती के नाम पर सोशल मीडिया का फैला हुआ जाल होगा,
जहां मन का द्वेष भी एक लाइक तो कर ही देगा।

बदलाव प्रकृति का नियम है तो क्या हुआ, कि बदलते भारत में प्रकृति ही न रहे, न सुनाई दे वो दर्द की आवाज़ जो एक मासूम सी बच्ची ने दी होगी जब वो फसी होगी किसी दरिन्दे के पंजों में,
तो क्या हुआ अगर मिल जाएंगे और भारत के भविष्य चौराहों पर हाथ फैलाये हुये, तो क्या हुआ गर और बढ़ जाएगा ऊंच नीच का फासला, क्या हुआ गर सैकड़ों बेरोजगार भीड़ बनकर मार देंगे किसी एक और निहत्थे को धर्म के नाम पर।


अब बदलना तो है ही, तो फिर बदलने दो आज, कल और कल के भारत को।

Monday, July 23, 2018

कायर हो तुम #KayarHoTum

कायर हो तुम
जो देख नहीं सकते किसी को आगे बढ़ता
कायर हो तुम
जो नहीं चाहते ऐसे हालात से उबरना
कायर हो तुम
जो अपनी चीजों के लिए औरों पर इल्जामात रखते हो
कायर हो तुम
जब बात खुद पर आती हैं तो लाखों सवालत करते हो
कायर हो तुम
जो दिखता नहीं तुम्हें अपने आगे कोई
कायर हो तुम
जब बुज़दिली में तुम्हें सूझे न कुछ भी
कायर हो तुम
जब शराब के नशे में सारे जज़्बात जागते हैं
कायर हो तुम
जो अपनी जिम्मेदारियों से बार बार भागते हो।
कायर हो तुम


"जब अपने फर्ज़ की जगह
वो हर चीज जिसको तुम सिर्फ किसी कमजोर पर अपनी शक्ति दिखाने के लिए करते हो तो समझ लो"
"कायर हो तुम"

Thursday, October 12, 2017

औरतें किसी की बापौती नहीं हैं....

ख़ुद एक महिला होने के कारण शायद आप मुझे महिलाओं की हिमायती या कुछ और समझे, मुझे कोई समस्या नहीं है। क्यूंकि जिस लेवल का महिलाएं घरेलु मानसिक और शारीरिक अत्याचार सह रही हैं, उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में रेप से सम्बंधित एक कानून लाया है, जिसमें 18 साल से कम उम्र की लड़की चाहे वो शादी शुदा ही क्यों न हो, उसके साथ किया शारीरक सम्बन्ध रेप ही माना जायेगा। भाई फ़ैसला तो क़ाबिले तारीफ़ है, क्यूंकि जल्दी शादी करने को लेकर समस्या ही यही थी। कुछ माता पिता तो आर्थिक तंगी से, लेकिन कुछ बस इसलिए अपनी बेटियों की शादी जल्दी कर देते थे, कि कहीं उनके साथ कुछ बुरा न हो जाये या वो किसी के साथ प्रेम में न पड़ जायें। बस उनकी शादी करा दी जाये, फिर चाहे शादी के बाद उनका पति उनके साथ जो भी करे, सब जायज़। सिर्फ शादी किसी को भी हक़ दे देती है, कि औरत तो उनकी बापौती है।

पिछले दिनों मेरे सामने दो बाते आई, एक तो मैंने अपनी एक सीनियर का लेख पढ़ा जिसमें उन्होंने एक महिला के बारे में बताया, कि उस महिला की कम उम्र में शादी कर दी जाती है। और शादी की पहली रात उसका पति उसके साथ इतनी बुरी तरह से सेक्स करता है, कि उस महिला के मुँह से फैना आ जाता है और वो बेहोश हो जाती है। उसका पूरा बिस्तर खून से लथपथ हो जाता है। ये लाइन पढ़कर मेरे पूरे शरीर में एक कौंध सी दौड़ गई। मेरे दिमाग में बस यही था की क्या बीती होगी उस महिला पर, वो अचानक से तो बेहोश हुई नहीं होगी, कितना भयानक मंजर होगा उस महिला के लिए। ये उसके साथ एक बार नहीं कई बार हुआ और इतना सबकुछ होने के बाद भी हर रात वो ये झेलती थी। शादी के काफी सालों बाद जब उस महिला से पूछा गया कि अभी आप उस समय के बारें में क्या महसूस करती हो, तो उनका जवाब था, क्या करे मैडम जी मर्द तो ऐसे ही होते है, उन्हें तो हक़ जमाना ऐसे ही आता है। वाकई! सिर्फ़ मर्दों का हक़! औरतों का हक़ कहाँ है भाई?

ये सिर्फ एक महिला की कहानी नहीं है। क्यूंकि जो दूसरी बात मैंने जानी वो ये है, कि हाल ही में मैंने वर्ल्ड बैंक की SDGs (Sustainable Development Goals) के ऊपर एक रिपोर्ट पढ़ी, जिसमें एक सर्वे से ये पता चला है की विश्व में 40% महिलाओं को ये हक़ तक नहीं है कि वो कब गर्भ धारण करना चाहती है और कब नहीं। साथ ही वो अपने स्वास्थ्य सम्बन्धी फैसले भी खुद से नहीं ले सकती। ऐसे तो भारत में अभी भी महिलाओं को बहुत से फैसले लेने का हक़ नहीं है। लेकिन कम से कम ये हक़ तो होना चाहिए कि कब वो सेक्सुअली कम्फ़र्टेबल है और कब नहीं। सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला शायद उन लोगों के लिए मददगार होगा, जो इसके लिए आवाज़ उठाएंगे। क्यूंकि कब से हमारे यहां बाल विवाह पर कानून है। इसके बावजूद बाल विवाह आज भी हमारे समाज में है। मैं तो उन सब बच्चियों, लड़कियों, महिलाओं को बस इतना कहना चाहूंगी, कि कानून हमारा सहारा, हमारा हथियार बन सकते है। लेकिन उनको चलाना हमें ही हैं। तो अपने अधिकारों को पहचानकर जो जैसा है वैसे में मत रहिये। आपको भी उतना ही हक़ है जितना बाकि सभी को। 

Wednesday, September 6, 2017

औरत ही #Female

वो घन्टों तक चलती है लाने को थोड़ा सा पानी,
बुझा सके जिससे वो अपनों की प्यास.
वो छोड़ देती है घर अपना, 
निभाने को जिम्मेदारियां परिवार की.
बिनती है टुकड़ा टुकड़ा बनाने को फिर से एक नया घर, 
जो उजड़ा था पिछली रात को,
थकती नहीं है कभी वो अपनी जिम्मेदारियों से.
क्या बनाओगे उसे, 
वो दाता भी है, दासी भी, 
नेता भी है  और सेवक भी.
वो कोई और नहीं, है औरत ही.

Tuesday, August 1, 2017

एक #Click की कीमत तुम क्या जानो #Viewer बाबू...

अब कीमत किसकी है और ये कीमत लगा कौन रहा है और उसका फल कौन पा रहा है. इसका आकलन करना थोड़ा मुश्किल है. क्योंकि आजकी इस इन्टरनेटीय नुमाइश में हर किसी को इंतजार है तो बस एक क्लिक का. फिर चाहे उसके लिए फूहड़ता की कोई भी हदें पार करनी पड़े या मनोरंजन के नाम पर कुछ भी परोसा जाये, इससे किसी को कोई मतलब नहीं.

एक समय था जब लोग कला के कद्रदान थे, और कलाकार भी ऐसे कि बस वाहवाही के भूखे. ऐसे ही दौर ने न जाने कितने कलाकारों को जन्म दिया है. ऐसा नहीं है कि आज कलाकारों की कमी है. आज भी एक से बढ़कर एक कलाकार पैदा हो रहे है. लेकिन इन सब के बीच कुछ बरसाती मेढ़क ऐसे आ जाते है, जो कला के मायने ही बदल देते है. वैसे आज के इस दौर में सब कुछ डिजिटिलाइजेशन पर ही चल रहा है. यहाँ तक कि कला की ये परख भी. बस एक क्लिक की दौड़ में हमारे कलाकार भाग रहे है. कैसे भी करके एक क्लिक मिल जाये बस. अगर सब्सक्रिप्शन हो जाये तो शायद उन्हें रात भर नींद ही न आये. उनके हुनर को पहचान तभी मिलेगी जब उनके फोलोवेर्स सोशल मीडिया पर ज्यादा होंगे. इस भीड़ का हिस्सा न जाने कितने लोग बनते जा रहे है.

पहले के कलाकार कहते है कि हमारे समय पर ये सब नहीं था. रेडियो टेलीविज़न, समाचार पत्रों के ज़रिये उन्हें पहचान मिल जाती थी. उनका यही हुनर उनकी पहचान को बनाये रखता था. उनके अनुसार पहले बहुत ज्यादा मशक्कत करनी पड़ती थी किसी भी काम के लिए. जबकि आज का दौर अलग है एक क्लिक से इन्सान रात भर में फेमस हो जाता है. लेकिन अब भला उन्हें कौन समझाए कि ये एक क्लिक पाने के लिए लोग क्या क्या करने को तैयार हो गये है. मुझे तो ये लगता है शायद लोगों ने अपना दिमाग कहीं ख़ुफ़िया तिजोरी में छुपा कर रख दिया है. सोचा ऐसे ही काम चल रहा है तो इसकी क्या जरुरत. वैसे वाकई हमने अपना दिमाग कहीं छुपा दिया है क्या? क्योंकि मनोरंजन के नाम पर जो  मार्केट में आ रहा है, और उसे हम खुले हाथों से ले रहे है, तो कहीं न कहीं कुछ न कुछ झोल जरुर है. 

वैसे फेसबुक पे भी अब विडियो पोस्ट का इतना हुजूम फ़ैला है की पूछो मत. पहले तो इतने लम्बे लम्बे पोस्ट शेयर किये जाते थे. लेकिन जब लगा कि इन पोस्ट को पढने के लिए लोगों के पास समय ही नहीं है. तो जन्म हुआ विडियो स्टोरीज का. फेसबुक से लेकर इन्स्टा, ट्विटर भर गया इन वीडियोज से. लेकिन अब लगता है लोगों का  इन बेफिजूल वीडियोज से भी मन भरता जा रहा है. ऐसे में कुछ हुनरबाजों के लिए ये दिक्कत आ गई कि अब वो कैसे अपने हुनर को दिखाए? शायद मैंने ही अभी नोटिस किया हो कि अब हर वो दूसरा आदमी जो अपने आप को हुनारबाज मानता है, अपने विडियो के ऊपर लिखता है कृपया आखिरी तक देखे. या कई तरीकों से ये बात मनवाता कि आप आखिरी तक देखोगे तो ही मज़ा आयेगा या आप इस कहानी को तभी समझ पाओगे. सच में प्रतिस्पर्धा की इस दौड़ ने एक तरफ तो बस एक क्लिक के ज़रिये धिन्चक पूजा जैसे (उनके ख़ुद की जुबानी) कलाकारों को पैदा किया है. वही किरण यादव जैसे लोगों के फोलोवेर्स बढ़ाये है. सच में साइबर की इस बढ़ती दुनिया में एक अलग ही किस्म का मनोरंजन पैदा हो रहा है. जहाँ ये फ़र्क करना मुश्किल है कि क्लिक करके आप एंटरटेन हो रहे हो या किसी के क्लिक बढ़ाके उसे एंटरटेन कर रहे हो.