Monday, July 31, 2017

#savehumanity कोई भी जंग कभी मुबारक नहीं होती

भारत को आज़ादी गुलामी से परेशान लोगों  ने दिलवायी थी, कोई हिन्दू या मुसलमान ने नहीं... तो ज़ितना ये देश हिन्दुओ का हैं उतना ही मुसलमानो का. कहां से लोगों के अन्दर इतनी क्रूरता आ रही हैं.. क्या हैं ये?? 
मुसलमान होना गुनाह है क्या??? हलक से निबाला कैसे ऊतरा होगा उन लोगों के ज़िनके हाथ एक बच्चे को मारने से पहले कापे नहीं. 
गाय गाय गाय बस हर तरफ सिर्फ गाय... ये साला इतना ही प्यार हैं गायों के प्रति तो आज इतनी सारी गाय रोड पर घूमती क्यूँ नजर आती हैं. ज़ितने लोग भीड बनके किसी को मारके चले जाते हैं अगर उतने लोग ही गायों को पाल ले तो कुछ गायों की वजह से कोई और धर्म की बली नहीं चढ़ेगा. किसी को ट्रफेक में भीख मांगते बच्चे क्यूँ नहीं दिखते? किसी को क्यूँ नहीं सुनाई देती किसी लड़की की चीखे जब उसके साथ रेप होता हैं? क्यूँ नहीं मिटाता कोई ऊँच नीच का फासला? कब तक हम एक दूसरे को नोचते रहेंगे? क्यूँ नहीं समझ आता लोगों को हिंसा हर बात का सुधार नहीं हैं? ऐसा करके हम एक नये ग्रह युद्ध को बढावा दे रहे हैं और कमलेश्वर जी ने अपनी किताब 'कितने पाकिस्तान' में कहा हैं कि "कोई भी जंग कभी मुबारक नहीं होती" #savehumanity #violenceagainsthumanity #liveyourlife

Tuesday, January 10, 2017

महिलाओं की इज्जत को उनकी योनी में किसने रखा? #Kamla_Bhasin


वैसे तो महिलाओं की सुरक्षा आज के समय में सबसे अहम् मुद्दा है. लोग इसके बारें में खुलके बात करते हैं. हम महिलओं को कैसे सुरक्षित रख सकते है इसके तरीके बताते है. महिलओं को अपनी सुरक्षा को लेकर क्या क्या करना चाहिए ये भी बताते है. हमारे इस बुद्धिजीवी समाज में न जाने ऐसे कितने लोग मिल जायेंगे. लेकिन बंगलौर में घटित घटना सबकी असलियत को उजागर करती एक तस्वीर है. ये तो उस जगह की बात है जो बुद्दिजीवी के क्षेत्र में अपना एक स्थान रखता है. अब सोचिये न जाने कितनी ऐसी जगह हैं जो हर तरह से पिछड़ी है ऐसे में वहां क्या हो रहा है इसकी तो किसी को खबर तक नहीं है. न ही उनकी आवाज को कोई चेहरा मिल पा रहा है. ऐसे में इसका मापन कैसे हो. 

लाहौर में अभी हाल ही में पंजाब सेफ सिटीज अथॉरिटी और पंजाब कमीशन ऑन द स्टेटस ऑफ़ वोमेन ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक एप्प बनाई जिसमें वो ये भी अंकित कर सकती है कि कौन सी जगह उनके लिए खतरनाक है. चलो ये तो लाहौर की बात रही. लेकिन फिर भी, है तो महिलओं की सुरक्षा को लेकर. वैसे मेरी बात का तात्पर्य यही है कि जब इतनी बातें, सेमिनार, वर्कशॉप होते है. यहाँ तक की महिलाओं की सुरक्षा कैसे की जाये इस पर डिबेट भी होता है. फिर भी परिणाम स्वरुप हमारे हाथ में लगता क्या है? अब जब एप्प ऐसी बनाई जा रही है, जिसमे हम जगह अंकित कर सकते है कि कौन सी खतरनाक है. तो बात यहाँ ये उठती है. कि वो जगह खतरनाक क्यों है? और अगर इतनी खतरनाक है तो महिलाओं को वहां जाने की जरुरत क्या है? तो किसी एप्प में अगर ये बात आ गई है कि जगह कौन सी खतरनाक है. तो ऐसे में उन जगहों का ब्यौरा बनाकर वो क्यों खतरनाक है इस पर कार्य करना चाहिए. 

ये तो रही एक बात. अब बात दूसरी ये है कि हम कितना भी अपनी महिलाओं के लिए सुरक्षा मुहैया करा दे. लेकिन उनके खिलाफ़ वारदात कम नहीं होती. ऐसे में बात ये सामने आती हैं कि कोई भी हेल्पिंग नंबर और एप्प तब तक कार्य नहीं करेगा जब तक हम एक निश्चित सजा निर्धारित नहीं करते. और सजा के साथ एक समय सीमा भी. क्योंकि जो मैंने देखा है पिछले दिनों में वो ये है कि अब हमलावरों के अन्दर डर नहीं रहा हैं किसी भी घटना को करने से पहले वो परिणामों के बारें में नहीं सोचते. अब उनके अन्दर एक अजीब सी बेचैनी है जो उनके सोचने समझने की शक्ति को उस पल के लिए खत्म कर देती है. दूसरी बात की उनकी परवरिश किस माहौल में हुई है. जहाँ उनके अन्दर किसी भी चीज के लिए सोचने समझने की शक्ति उत्पन्न नहीं होती. व कुछ ऐसी सोच वाले भी होते है जिनके लिए महिला सिर्फ उपभोग की वस्तु है. उससे अधिक अगर उसने कदम बढ़ाएं तो उसके कदम को वही कुचल दिया जाता है. हमें आज महिलाओं के लिए सुरक्षित समाज से ज्यादा जो पीड़ित महिलाएं है उनके लिये एक बेहतर समाज बनाने की जरुरत है. क्योंकि हमेशा घर से निकलने से पहले उनके मन में ये ख्याल तो आता ही है कि कही कुछ हो गया तो. लेकिन उससे भी अधिक डर उन्हें ये विचार करता है कि वो किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं बचेंगी. व समाज उनके बारें में क्या सोचेगा. तो डर उन्हे घटना का नहीं बल्कि घटना के बाद के परिणामों का हैं. जो हम उन्हें देते है. 

अपराधी तो अपराध करके चला जाता है. लेकिन उसके अपराध की सजा हम महिलाओं को देते है. सबसे पहला जो विचार आता है कि उसकी इज्जत लुट गई. तो यहां मुझे 'कमला भसीन' जी की एक बात याद आती है कि महिलाओं की इज्ज़त को उनकी योनि में किसने रखा। इज्जत का मतलब क्या होता हैं?  जबकि इज्ज़त से ज़्यादा उसके आत्मसम्मान के बारें में कोई बात क्यों नहीं करता,  कोई उसकी इच्छा के विरुद्ध जो अपराध हुआ है उसके बारें में बात क्यों नहीं करता, कोई ये बात क्यों नहीं करता कि उस पीड़िता को कैसे समाज में सम्मान से रहने दिया जाये. अगर हम ऐसा समाज बनाने में सफल हो गये, जहाँ दोषी को दोषी ही माना जाये, पीड़िता को सम्मान से जीने दिया जाये. तो महिलाओं के अन्दर ये डर कि समाज क्या सोचेगा नहीं रहेगा. और दोषियों की प्रवत्ति, की इनको सबक सिखाना चाहिए वो भी कम होगी. और शायद सम्मान के साथ महिलाओं के अन्दर इन अपराधों से लड़ने की ताकत आ जाये. और उनकी इस ताकत को देखकर अपराधी अपराध करने से पहले १० बार सोचें. क्योंकि महिलाएं सशक्त हैं. वो अपना अच्छा बुरा अच्छे से जानती है. बस उनके इस सशक्तिकरण को समाज में जगह दिलवानी हैं. ये सब कुछ कल्पनायें है जो किसी किसी के समझ से तो परे है क्योंकि अब हमारी प्रवत्ति सोचने समझने से हटकर हमलावर हो गई है. वो कहते है न डूबते को तिनके का सहारा और एक चिंगारी आग लगा देती है. बस अब हम यही कर रहे है. तिनका मिलता नहीं और चिंगारियां तो आये दिन आग लगाती रहती है.

Monday, October 10, 2016

#Blue_Shirt

यात्रीगण ध्यान दे वैशाली की ओर जाने वाली गाड़ी प्लेटफार्म नंबर २ पर आ रही है.

ओहो गाड़ी भी आ गई. लड़कियों के लिए लगी लम्बी कतार में मेट्रो परिसर में अपनी एंट्री का इंतज़ार करती हुई सनाया आज 5 मिनट लेट उठने पर अफ़सोस जता रही थी. काश मैं 5 मिनट पहले उठ गई होती तो मुझे ये मेट्रो मिल जाती.
अब मै 5 मिनट देरी से ऑफिस पहुँच पाऊँगी और 5 मिनट की देरी पर वो राक्षण मेरा सिर खा जायेगा. नरक हो गई है जिंदगी यहाँ. क्या सोचके के घर से निकली थी कि बड़े शहर में हज़ार मौके मिलेंगे. 4 साल इंजीनियरिंग की पढाई का कुछ तो फल मिलेगा. आखिर कार टोपर थी मैं. लेकिन यहाँ आके जिंदगी क्या हो गई है. करने के लिये तो कोई काम बुरा नहीं हैं, लेकिन मैं कब तक इसमें अपना टाइम बर्बाद करूंगी. 9:30 से 6:30 बजे तक वाली जिंदगी मैं ज्यादा दिन तक नहीं झेल सकती. और इस बड़े से शहर में कोई नहीं हैं मेरी ये बातें सुनने वाला.

और तभी मैडम मैडम आपका बैग मेट्रो चेकिंग के अन्दर खड़ी महिला कांस्टेबल सनाया को उसकी हताशा से भरे ख्यालों से निकाल देती है.

सनाया उसे शक की नजरों से देखती है और अंदाजा लगाती है कि उसने अभी क्या बोला.

फिर वो कांस्टेबल अरे मैडम अपना बैग मशीन में रखकर आइये.

ओह्ह्ह सॉरी. अपनी बेवकूफकाना हरकत पर सनाया को थोड़ी सी शर्मिंदगी होती है फिर वो बाहर आकर बैग चेकिंग वाली मशीन में अपना बैग रखती है फिर खुद सेल्फ चेकिंग वाले एरिया से निकल कर जैसे ही अपना बैग उठाती है उसी के साथ ही वो झटके से बैग उठाने के चक्कर में  किसी और का बैग गिरा देती है.

ओह्ह्ह आई ऍम सो सॉरी.

इट्स ओहक सामने खड़ा एक नौजवान शालीनिता भरी मुस्कान के साथ बोलता है.

सनाया उसकी मुस्कान को अनदेखा सा करके अपनी ट्रेन पकड़ने के लिए चली जाती है.

जैसे ही मेट्रो आती है सनाया पीछे मुड़कर देखती है तो वही लड़का उसके पीछे खड़ा होता है. मेट्रो के गेट के खुलते ही दोनों अन्दर प्रवेश कर लेते है, सनाया बड़े स्टाइल में अपना फ़ोन निकालती है और इअरफ़ोन लगाकर गाने सुनने लगती है. जैसे ही उसका स्टेशन आने वाला होता है. तो मेट्रो के शीशे से वो देखती है कि वही लड़का उसके पीछे खड़ा है. सनाया मन ही मन में सोचती है कि अब क्या ये मेरे साथ उतरेगा भी.

और होता भी वैसा ही है. सनाया की तरह वो लड़का भी उसी स्टेशन पर उतरता है. फिर एग्जिट गेट की लाइन से लेकर मेट्रो स्टेशन के बाहर तक वो लड़का सनाया के पीछे पीछे ही चलता है. अब इसे संजोग कहे या किस्मत. कि जिस शेयरिंग टैक्सी में सनाया बैठती है. वो लड़का भी उसी टैक्सी में बैठता है. अब तो सनाया का गुस्सा बढता ही जा रहा था. मन में न जाने कितने ख्याल आ रहे थे. और तो और थोड़ी थोड़ी देर में न चाहते हुए भी सनाया की नज़र उसकी ओर चली जाती थी, और जैसे ही वो लड़का सनाया की ओर देखता. सनाया ठिठक के अपना मुंह फेर लेती. मतलब अब ये मुझे ताड़ भी रहा है, अगर ये मेरे साथ ही उतरा तो फिर तो मै इसे सबक सिखा ही दूंगी. सनाया न जाने कितने ऊल जलूल ख्याल अपने मन में ला रही थी. तभी उसके कानों ने एक आवाज़ सुनी, जो उसी लड़के की थी- भैया बस आईटी चौराहे पर रोक दीजियेगा. फिर टैक्सी रूकती है और वो लड़का उतरकर चला जाता है.

अब तो सनाया को और भी गुस्सा आने लगा, लेकिन इस बार ख़ुद पे. तुम समझती क्या हो सनाया ख़ुद को, कहीं की हूर हो, कि हर लड़का तुम्हारे पीछे ही आयेगा. एक तो तुमने उसका बैग गिराया ऊपर से इतनी देर से उसके बारे में न जाने क्या क्या सोच रही हो. हद होती है किसी चीज की. सच में अब तो कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा. दिमाग ख़राब होता जा रहा है मेरा.
तभी टैक्सी वाले भैया. मैडम बासठ आ गया.

दूसरे दिन सनाया उसी जल्दबाजी के साथ मेट्रो स्टेशन की सीडियाँ चढ़ रही थी. ओहो आज फिर पांच मिनट लेट हो गयी यार. फिर से ये वाली मेट्रो मिस हो जाएगी. जल्दी जल्दी चेकिंग एरिया पार करके सनाया प्लेटफार्म पर पहुचती है तो देखती है कि वही लड़का प्लेटफार्म पर पहले से ही खड़ा है. वही ब्लू शर्ट में. उसे देखते ही सनाया ने अपनी नजरे चुराई और एक ओर देखने लगी. ट्रेन आई और दोनों उसमे सवार होके अपनी अपनी मंजिल को चल दिए.
सनाया को हर रोज वो लड़का मेट्रो स्टेशन पर मिलता, कही एंट्री के टाइम या प्लेटफार्म पर या फिर एग्जिट के समय. लेकिन मिलता ज़रूर था. और उसी ब्लू शर्ट में. शायद उसके ऑफिस की ड्रेस हो. सनाया अक्सर उसे देखके यही सोचती.

कभी कभी तो एग्जिट करते टाइम अगर सनाया पीछे खड़ी हो तो वो सनाया को पहले एग्जिट करने के लिये ऑफर करता. और तो और टैक्सी में भी सनाया को आता देख वो साइड में खिसक जाता और सनाया को सीट ऑफर करता.

बिना बोले ही सनाया को ऐसे लगता कि जाने कितनी बात कर ली हो उससे. सनाया को भी अब आदत सी हो गई थी उसकी. और अब तो बिना बडबडाये हर रोज जानबूझकर पांच मिनट लेट निकलती थी. आखिरकार मेट्रो की हर रोज की बदलती भीड़ में एक चेहरा जो मिल गया था. वो ब्लू शर्ट.

बस फिर क्या दो तीन महीनें तक यही सिलसिला चलता रहा. न उसने कुछ बोला और न ही सनाया ने. बस वो 8:20 वाली मेट्रो उनका पत्ता थी. और उस आईटी चौराहे तक का उनका सफ़र. अब सनाया भी कोशिश करती थी कि वो उसी टैक्सी में आके बैठे. इसीलिए जानबूझकर वो टैक्सी के दूसरी साइड नहीं खिसकती थी. जैसे ही वो ब्लू शर्ट वाला लड़का आता तो वो खिसक के उसे जगह देती. ये सिलसिला यूँही चलता जा रहा था.

फिर एक दिन हर रोज की तरह सनाया अपना मेल बॉक्स चेक कर रही थी. तभी वो देखती है कि उसकी मेल लिस्ट में congratulation का एक मेल होता. जैसे ही सनाया उसे खोलती है तो उसकी आँखे खुली की खुली रह जाती है. ओह माय गॉड मेरा सिलेक्शन लैटर आ गया. वो तुरंत अपना फोन उठाती है. और अपने घर पर फोन लगाती है.

हेलो मम्मी, मम्मी मेरा सिलेक्शन हो गया एक बहुत बड़ी आईटी कंपनी में. जिसके लिये मैंने पिछले महीने written दिया था. जिस दिन का मुझे इतना इंतजार था वो दिन आ गया मम्मी. मंडे बुलाया है. सारी formalities के बाद. next डे से ही जोइनिंग हैं.

अपनी ख़ुशी सबमे बाँट कर सनाया जब बैड पर लेटी हुई ऊपर की ओर देख रही थी, तभी उसे एहसास होता है. कि इस नयी नौकरी के साथ सब बदल जायेगा. उसका ऑफिस, आसपास के लोग, वो ऑफिस के बाहर टपरी वाली चाय, और वो 8:20 वाली मेट्रो. अचानक से ही सनाया की सारी खुशियों में जैसे ग्रहण लग गया. और वो बेचैन होने लगी.  


पूरी रात वो बस यही सोचती रही. कि अब वो क्या करेगी. मुझे तो ये भी नहीं पता की क्या मैं उसे पसंद करती हूँ. अगर वो न करता हो तो. हमारे बीच जो चल रहा है वो बस एक दूसरे का बहम हो. और मै उससे बोलूंगी क्या, किस हक़ से बोलूंगी कि मैं अब से इस रास्ते नहीं आऊँगी. कि अब से हमारे रास्ते अलग हो जायेंगे. और शायद अब हम कभी न मिल पाए. या फिर कम से कम उसका नाम ही पूंछ लूंगी. अपने मन और दिमाग की लड़ाई में सनाया ने पूरी रात गुजार दी. 

सुबह जल्दी उठके बिना कुछ सोचे वो निकल पड़ी उस 8:20 की मेट्रो के लिए. एंट्री गेट से लेकर प्लेटफार्म तक सनाया की नजरे बस एक ही चीज ढूढ रही थी. वो ब्लू शर्ट. ब्लू शर्ट तो बहुत मिली लेकिन वो वाली नहीं जिसका सनाया को इंतजार था. एग्जिट के टाइम भी सनाया ने बहुत कोशिश की. कि कहीं से वो उसे दिख जाये लेकिन उसका कहीं पता नहीं था. थक हार के सनाया टैक्सी स्टैंड पर पड़ी चेयर पर बैठ गई. और सोचने लगी अब क्या होगा कैसे उसे मैं ढूढूगी. मुझे तो उसका नाम तक नहीं पता. बस एक ही चीज हैं उसकी जो मुझे याद है. बस उसकी वो ब्लू शर्ट. 

Thursday, October 6, 2016

आँखे बंद जब की मैंने

आँखे बंद जब की मैंने, तो तेरी परछाई का एहसास हुआ, खोलते ही गुम गया तू, तब मुझे ये एहसास हुआ, कि तू है कहीं आसपास मेरे, साया तेरा मुझमें ही हैं. रखती हूँ कदम जहाँ भी, छाया तेरी मुझपे ही हैं. जब जब ये धड़कन बढ़ती है, तेरी ही नज़र का जादू है जो साथ साथ चलती है. हर चेहरे में जब तेरा चेहरा ढूढती हूँ. मचल उठती हूँ मैं जब उनमें तुझे न पाती हूँ. कहा हो तुम कैसे हो तुम, बस ये ख्याल अब दिल को सताता हैं, मिल पाऊँगी कभी क्या मै तुमसे, बस ये फिक्र मुझे जलाती है. कुछ न बाकी है अब हमदम, अब तुझसे बस मिलना है. कहाँ हैं तू कैसा हैं तू बस ये अब मुझको सुनना है. जबतक साँसे चल रही है तब तक तुझसे मिलने कि आस है. तो क्या मिलोगे तुम बस एक बार चाहे आखिरी बार.

Wednesday, September 28, 2016

#Equality - हम सब एक है....

हैं कौन देश का वासी तू,
और क्या तेरी जात है,
हिन्दू है या मुस्लिम है तू,
अरे क्या तेरी पहचान है,
है क्या तू इसी दुनिया का,
या अलग ही तेरा जहान है,
देखा मैंने जहाँ जहाँ 
तू मिल जाता है वहां वहां,
लिए हाथ में खंजर सीने में पत्थर
मन द्वेष आखों में नफ़रत,
है किसकी तुझे तलाश है,
क्यों ये इतना वैर है और 
क्यों ये खून की प्यास है,
क्या भूल गया कि इंसान है तू,
तुझसे ही ये धरती आसमान है,
मिलके बनाते हो तुम ही घरोंदे ,
फिर क्यों उसको खुद ही उजाड़ने के ख्याल है,
नहीं समझ सकता मैं इस सत्ता को,
जहाँ एक हाथ में हथियार दुसरे में गीता कुरान है.

Monday, August 15, 2016

ऐ माँ....

है कुछ किस्से यादों की लोरी में,
आधे तेरे आधे मेरे,
चलना है साथ बस यू ही,
चाहे सांज हो या सबेरे,
तेरे आंचल के साये में,
संभले है हालात मेरे,
दूर हूँ  अभी तो क्या ऐ माँ...
नजरों की दूरी बाँट न सकती प्यार को तेरे......