Sunday, March 26, 2023

कुपोषण, पोषण सम्बन्धी विश्व का सबसे बड़ा स्वास्थ्य भार #Malnutrition

पोषण न सिर्फ़ शारीरिक बल्कि मानसिक असंतुलन के लिए ज़िम्मेदार होता है| बदलती जीवनशैली और वैश्वीकरण के कारण खाने में बहुत ही विविधताएँ आयी हैं, एक चीज जो अभी भी नहीं बदली है, कि लोग अभी भी सिर्फ़ भूख के लिए खाते हैं, पोषण के लिए नहीं| उनका ध्यान होता है कि पेट भरना चाहिए, पेट भरने की प्रक्रिया में पोषण कितना मिल रहा है, उसपर अभी उतना ध्यान नही दिया जा रहा है| 

व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण-2016-18 (सीएनएनएस 2016-18) की रिपोर्ट के अनुसार कुपोषण सिर्फ़ प्रदेश या देश स्तर की बात नहीं बल्कि बच्चों और महिलाओं में कुपोषण की स्थिति पोषण सम्बन्धी विश्व का सबसे बड़ा स्वास्थ्य भार है| यानि सिर्फ़ सही पोषण की कमी के कारण यह समस्या अभी भी विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या बनी हुयी है| 

रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में छः से 23 माह तक के सिर्फ़ 4.3 प्रतिशत शिशुओं को न्यूनतम स्वीकार्य आहार मिलता है| यानि एक शिशु को जितना आहार मिलना चाहिए लगभग उतना ही| 

सर्वे के अनुसार यदि बच्चों में पोषण की बात करें तो नवजात या बच्चों को वयस्क से ज्यादा पोषणयुक्त भोजन की आवश्यकता होती है| एक नवजात को जहाँ 120 केलोरी प्रति एक किलो चाहिए होती हैं वही दस साल से अधिक उम्र को 56 केलोरी प्रति किलो की जरुरत होती है|

सरकार के द्वारा भी शिशुओं के सही पोषण के लिए शुरुआती एक हज़ार दिन को बढ़ावा दिया जा रहा है| जिसके अंतर्गत जन्म से लेकर शिशु के दो साल तक के समय में सबसे ज्यादा पोषण पर ध्यान देने की जरुरत होती है| छः माह तक तो सिर्फ़ स्तनपान ही कराना होता है, उसके बाद शिशु के पूरक आहार पर ध्यान देना होता है| राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे- 5 (2019-21) के अनुसार प्रदेश में छः माह से 23 माह तक के सिर्फ़ 5.9 प्रतिशत बच्चों को स्तनपान के साथ पूरक आहार दिया जा रहा है| वहीँ आधी आबादी कहीं जाने वाली महिलाओं में भी 15 से 49 उम्र की लगभग 50 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी की समस्या से ग्रसित हैं| वहीँ 15 से 49 वर्ष के 21.5 प्रतिशत पुरुषों में खून की कमी की समस्या है| 19 प्रतिशत महिलाओं का बॉडी मास्क इंडेक्स (बीएमआई) नार्मल से कम हैं वहीँ, 17.9 प्रतिशत पुरुषों का बीएमआई नार्मल से कम हैं| 

किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज की न्यूट्रीशन विभाग की हेड डॉ. सुनीता सक्सेना बताती हैं सही पोषण के लिए जरुरी है कि सभी अपनी डाइट में सभी खाद्य समूहों को शामिल करें, जैसे कि कार्बोहाईड्रेट, प्रोटीन, फैट, विटामिन, मिनरल, फाइबर, और वाटर| और अपने खाने को पूरे दिन में चार भागों में बांटे, सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना, शाम में हल्का खाना या तरल पदार्थ लेना, और रात का खाना| और कोशिश करे कि खाने में इंद्राधनुष के सभी रंग जैसे कि लाल, पीला, हरा, नारंगी, सफ़ेद/भूरा, नीला/बैंगनी शामिल करें| 

डॉ. सुनीता बताती हैं कि बच्चों से लेकर बड़ों तक को खाने का यही तरीका अपनाना चाहिए| बच्चों में खाद्य की मात्रा और उसे देने का तरीका अलग होता है| बच्चे हर चीज आसानी से नहीं निगल सकते, तो उनकी उम्र के अनुसार खाद्य पदार्थों को निगलने में सरल बनाते हुए खिलाना चाहिए| 

सही पोषण न मिलने के प्रभाव

डॉ. सुनीता सक्सेना बताती हैं कि सही पोषण न मिलने पर, शरीर पर बहुत से चिकित्सीय प्रभाव पड़ते हैं जैसे कि आंतों में संक्रमण, पोषक तत्व को अवशोषित करने में समस्या, मांसपेशियों की हानि, त्वचा में संक्रमण, पेनक्रियाज में समस्या, शुगर जोखिम में वृद्धि, लीवर व प्रतिरक्षा प्रणाली में समस्या, श्वासप्रणाली में संक्रमण,  हृदय रोग सम्बन्धी समस्या, भूख में कमी, सुस्ती, दीर्घकालिक विकासात्मक प्रभाव, थायरॉयड, तनाव, शारीरिक विकास, हार्मोनल असंतुलन आदि|

स्वीकार्य आहार

अनाज, कन्द व मूल, गाढ़ी पकी हुई दालें व फलियाँ, दूध व दुग्ध पदार्थ, अंडा, मांस व मछली, पके हुए नारंगी/ पीले रंग के गूदेदार फल एवं सब्जियां, हरी एवं पत्तेदार सब्जियां आदि|

बीएमआई

लंबाई के हिसाब से वजन का कम होना या अधिक होना की पहचान बीएमआई से की जाती है, यदि किसी का बीएमआई 18.5 किलोग्राम/मीटर² से 24.9 किलोग्राम/मीटर² है तो ही वह सामान्य श्रेणी में है यदि इससे कम या ज्यादा है तो वह अस्वस्थ है।

Wednesday, February 16, 2022

ज़हर लगते हो... #patriarchal

 तुम कहते हो कि मेरे लिए सब समान है, और अपने घर जाकर अपनी घर कि बहू बेटी को उनके अस्तित्व की वजह से कमतर मानते हो, मुझे बहुत जहर लगते हो।

तुम कहते हो कि नारी सशक्त है वह अब अबला नहीं सबला है, और फिर अपनी मर्दानगी का दिखावा करते हो, मुझे बहुत जहर लगते हो।

तुम कहते हो कि सबको शिक्षा का समान अधिकार है, हम जो चाहे पढ़ सकते है, और फिर एक निश्चित रास्ता तय कर देते हो, मुझे बहुत जहर लगते हो।

तुम कहते हो कि सबकी अपनी सोच है सबको अपनी बात रखने का अधिकार है, और फिर हमारी किसी भी बात को दरकनार  कर देते हो, मुझे बहुत जहर लगते हो।

तुम कहते कि लड़कियां तो हर क्षेत्र में झंडे गाड़ रही है, उनका कोई सानी नहीं, और फिर उनकी जगह दिखाने की कोशिश करते हो, मुझे बहुत जहर लगते हो।

Monday, August 2, 2021

ओलिंपिक्स #Olympics

ओलिंपिक्स में भारत की सहभागिता को 100 साल से भी ज़्यादा हो गए है। और अभी तक हम सिर्फ़ 30 मेडल ही अपने देश में लेकर आयें है, शायद इतने मेडल तो इस बार अकेला चीन ही लेकर जाए। खैर मेरा यहाँ मक़सद किसी की उपेक्षा करना नहीं हैं। लेकिन आप खुद ही सोचिए कि सबसे ज़्यादा पोषणयुक्त खाद्य पदार्थ उगाने वाला देश, दुनिया को योगा का पाठ पढ़ाने वाला देश में स्ट्रेंथ के स्तर पर हम इतने पीछे कैसे रह गए??? 

और क्या चीजें सिर्फ़ स्ट्रेंथ, मौक़े और संसाधन तक ही सीमित है????? नहीं.... चीजें सीमित है सोच में। हम आज अचानक से बेटियों के ऊपर अभिमान और हर्ष जताने लगे, उनकी संघर्ष गाथाएँ गाने लगे। मैं ये पूरे विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि मीराबाई चानु और पीवी सिंधू जब हाथ में मेडल लिए भीड़ से अलग खड़ी होंगी तो उनके सामने भी वो चेहरे होंगे जिंहोने उनके संघर्ष के समय को अज़ाब बना दिया होगा। और आज वहीं दोगुली खुशी के साथ ये भारत की बेटी है नारे लगा रहें हैं। उनकी सफ़लता उन लोगों  मुंह पर थप्पड़ तो हो सकती है लेकिन इस थप्पड़ तक की दौड़ में जितने लोग सफ़ल हुये हैं उनको हम उँगलियों पर गिन सकते है। लेकिन उनका क्या जो इस सीमित सोच, संसाधन और अज़ाब के कारण कहीं पीछे ही छूट गए?

जब मैं देखती हूँ कि कोई भी मेडल लेकर लोग इतिहास रच रहे हैं तो एहसास होता है कि चाहे महिला वर्ग हो या पुरुष वर्ग- कितना इतिहास रचा जाना बाक़ी है। ऐसे में यह विचार करने की बहुत जरूरत हैं कि हम कहाँ पिछड़ रहे हैं? अगर मैं झाँसी का उदाहरण दूँ तो मेजर ध्यानचन्द्र के द्वारा पहला गोल्ड मेडल लाया गया। उनके नाम को भी हम गौरव से लेते है, लेकिन उनके बाद हम कितने और मेजर ध्यान चन्द्र या कोई और नाम ले लीजिये को तैयार कर पाये। उनके नाम पर स्टेडियम बनाकर करोड़ों का कारोबार तो कर लिया लेकिन क्या हम एक विश्व स्तरीय सफ़ल खिलाड़ी दे पाएँ? जब हमें आधार मिल गया तो उस पर शिला क्यों नहीं बना पाये? 

क्यों भारत में आज भी लोग मज़बूरी में, कष्ठ झेलकर, बिना किसी सटीक दिशा के, किस्मत से रास्ता मिल गया तो ही आ पाते हैं। 

क्यों हम उस मुकाम की तैयारी के लिए खुद तैयार नहीं जिसकी वाह वाही करने से पीछे नहीं हटते??? क्यों??


Wednesday, August 19, 2020

सरकार और विभाग

सरकार और विभाग दोनों के कार्य करने के तरीके, कार्य करने वाले लोग, उनका उद्देश्य, उनकी मानसिक सोच सब बहुत ही अलग होता है। जबकि ये दोनों  ही सिक्के के वो पहलू है जिन्हे रहना हमेशा साथ ही है, लेकिन इनका अस्तित्व एक समय में एक ही पहलू का होता है। 

सरकार और विभाग के लोगों में जब इस तरह का अंतर होगा तो क्या आपको लगता है कि इनमें सामंजस्य के साथ कार्य करने की क्षमता होगी। विभागीय व्यक्ति इतनी मेहनत से पढ़ लिखकर आता हैं और नौकरी लगते ही उसका एक परिश्रम और जुड़ जाता है कि नौकरी को बचाना है। शायद यह डर उसे खुलकर अपनी बौद्धिक क्षमता से कार्य करने का साहस नहीं दे पाता, जो कुछ करते भी है उनका हाल भी ऐसा हो जाता है कि एक समय के बाद वो भी हाथ जोड़कर खड़े हो जाते है। रही सरकार तो इन लोगों से तो अपेक्षा ही नहीं की जा सकती, क्योंकि इनका भी अलग माइंड सेट है कि बस 5 साल की सरकार है तो वह सत्ता के नशे में ही बने रहते है। अगर कोई सत्ताधारी अच्छा कार्य करता है तो क्या अगले चुनाव में जनता उसका वहिष्कर करेंगी? मुझे तो नहीं लगता है। हाँ, ये जरूर है कि इसपर एक शोध किया जा सकता है।

जिस देश में चुनाव के समय वोट ही 50 प्रतिशत पड़ते है तो आप बाकी के 50 प्रतिशत को भी बहुमत में शामिल करना अलग बात है। आज के समय में एक आम नागरिक और एक वोटर दोनों की सोच और उनकी बातों में बहुत अंतर है। अब हर मुद्दा वोटर बनाम नागरिक हो रहा है।

खैर बात यहाँ सरकार और विभाग की है, अभी इतने मुश्किल दौर से पूरा विश्व गुजर रहा है, ऐसे में सरकार को चाहिए कि वो विभागों से सामंजस्य बिठाये, एक सत्ताधारी न होकर एक आम इंसान की तरह सोचे और अपने विभागीय सदस्यों को भरोसा दिलाये कि कुछ भी हो, हम आपके साथ है। क्योंकि जैसा माहौल बन रहा है और बनारस में चिकित्सा अधिकारियों के इस्तीफ़े के बाद शायद और भी बने, कि अगर एक साथ विभागीय लोगों ने इस्तीफा दे दिया तो क्या सरकार के पास बैक अप प्लान है?

Thursday, July 11, 2019

मर्द को दर्द नही डर होता है #WorldPopulationDay


पित्रसत्तात्मक समाज में यह बहुत ही तथाकथित कहावत है कि मर्द को दर्द नही होता। हर किसी साहस पूर्ण काम के लिए पुरुष सबसे पहले आगे आते है। यहाँ तक कि अगर वह आगे न आए तो उन्हे कायर करार कर दिया जाता हैं। लेकिन एक ऐसा क्षेत्र है जहां पुरुष किसी भी रूप में पहले खुद से आगे नही आते, या तो कोई मजबूरी, या लालच या फिर कही कही जबर्दस्ती ही उनको ये कदम उठाने के लिए आगे करती है, वह है परिवार नियोजन। जब जनसंख्या एकदम उफान पर है और हम कभी भी जनसंख्या के मामले में विश्व में पहले स्थान पर आ सकते है, तो क्या पुरुषों की ज़िम्मेदारी नही बनती की वह आगे आकार परिवार नियोजन जैसे अहम मुद्दे पर अपनी भागीदारी दिखाये। परिवार नियोजन का भार सिर्फ महिला पर ही क्यों?

ग्लोबल हैल्थ रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 40 प्रतिशत महिलाओं को ये अधिकार नही कि वह कब माँ बनना चाहती है और कब नही। जब उन्हे अपना गर्भ धारण करने की आज़ादी नही तो परिवार नियोजन की सारी चीज उनके कंधों पर क्यों डाल दी जाती है। आप बाज़ार या अस्पतालों में देखे तो कॉपर टी से लेकर, गोली, इंजेक्शन, नसबंदी सब महिला के लिए। पुरुषों के लिए एक दो साधन है भी लेकिन वो उसमें भी पीछे हट जाते है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस -4) के आंकड़े बताते है अगर कुल आधुनिक गर्भनिरोधक साधनों की बात की जाए तो 34% महिलाये नसबंदी करवाती हैं जबकि मात्र 1% पुरुष ही अपने हिस्सेदारी निभाते हैं जबकि उनके लिए ये विकल्प महिलाओं के मुकाबले बहुत आसान है।

अब पुरुष नसबंदी के लिए क्यों आगे नही आते उन्हे किस बात का डर है, जहां एक ओर एक महिला बच्चा पैदा करने से लेकर नसबंदी से संबन्धित ऑपरेशन के दौरान के सभी दर्द सहती है ऐसे में पुरुषो को किस बात का डर और दर्द होता है? इस बात का जवाब 2014 में लंदन स्कूल ऑफ हायजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिंस द्वारा किए गए सर्वेक्षण के में दिया गया है कि कम और मध्यम आय वाले देशों में पुरुष नसबंदी के लिए पुरुष इसलिए नही आते कि उन्हे ऐसा लगता है कि इससे पुरुषों के पुरुषार्थ अथवा यौन क्षमता पर असर पड़ेगा और लोग मज़ाक बनाएँगे वो अलग से। इसके साथ ही कुछ महिलाएं ऐसी होती है जो खुद पुरुषों को आगे आने नही देती, उन्हे लगता है ऐसा होने पर उनका पति किसी और के साथ संबंध बनाने के लिए भी आज़ाद हो जाएगा।

कहते है जीवन गाड़ी के दो पहियों के समान है और वो दो पहिये है महिला और पुरुष। लेकिन जब बात परिवार नियोजन की आती है तो सारा भार एक पहिये पर ही डाल दिया जाता है, यहाँ तक कि अगर किसी महिला को लड़का नही हो रहा तो उसमें भी उसी की गलती। अरे भले मानस थोड़ा तो दिमाग लगा लो। इसमें पढ़ाई का कुछ काम नही है क्योंकि मैंने अच्छे खासे पढे लिखे लोगों को भी यही करते देखा है।

Friday, June 28, 2019

मुझे नफरत है #Hate

मुझे नफरत है, हर चीज में जाति धर्म लाने से
मुझे नफरत है हर चीज को रंगों से जोड़ने से
मुझे नफरत है दूसरों का हक़ छीनने से
मुझे नफरत है किसानों के बेवजह मरने से
मुझे नफरत है नदियों का गलत दोहन करने से
मुझे नफरत है बेरोजगारी के बढ़ने से
मुझे नफरत है बेबुनियादी जुमले गढ़ने से
मुझे नफरत है लोगों के जज़्बातों से खेलने से
मुझे नफरत है इंसान को भगवान समझने से
मुझे नफरत है दूसरों पर आश्रित रहने से
मुझे नफरत है मुफ्त का खाने से
मुझे नफरत है भ्रष्टाचार बढ़ाने से
और मुझे नफरत है नफ़रत को और बढ़ाने से

You can never tell a Book by its Cover

Lester Fuller and Edwin Rolfe (उच्चारण गलत न हो इसलिए ऐसे लिखा) द्वारा कही गई ये कहावत सभी संदर्भों में सटीक बैठती है। इसका मतलब है कि किसी भी किताब को उसका कवर देखकर यह निर्धारित नहीं करना चाहिए कि ये अच्छी ही है, जबतक कि उसे पढ़ न ले। यही बात हमारे जीवन की हर चीज पर लागू होती है। जैसे कि ब्रम्हाण है तो शाकाहारी होगा, बिहारी है तो चालाक होगा, मुस्लिम है तो आतंकवादी होगा वगैरह वगैरह। ये बिना जाने पहचाने, बिना बात किए, बस किसी के कहने पर मान लेना वाली प्रवत्ति हम में कूट कूट कर भरी है। शायद इसी वजह से बहुत आसानी से हम भ्रमित हो जाते है। वैसे मेरे ये लेख लिखने का उद्देश्य आपकी भ्रमित प्रवत्ति को सही रास्ते पर पर लाना नही है, मैं यहाँ बस अपना एक अनुभव साझा कर रही हूँ, जिससे मेरा ये भ्रम हाल ही में टूट गया। शायद आप लोगों ने सुना हो या न लेकिन मैंने बहुत सुना है अपने दोस्तों से कि पहाड़ी लोग बहुत बफादार, और मदद करने वाले होते है। लेकिन अभी तक लगभग 4 पहाड़ी जगहों का भ्रमण करके मैंने ये जाना है और जैसे कि ये सार्वभौमिक सत्य भी है कि हर जगह हर तरह के लोग होते है आप उन्हे उनके पहाड़ी, उनके बिहारी या उनके काले, गोरे होने से जज नहीं कर सकते।

अभी हाल में मैं मेकलोडगंज (हिमाचल प्रदेश) घूमने के लिए गई, वहाँ पहले दिन घूमने की वजह से होटल आने में देरी हो गई, जिसकी वजह से होटल में हमें खाना नही मिल सका, जब हमने खाने के लिए मदद मांगी तो होटल में कोई ऐसा नही था जो हमारी मदद के लिए आगे आए, तब मैंने सोचा क्या सच में पहाड़ी लोग मददगार होते? फिर जब हम खुद बाहर खाना लेने के लिए निकले तो रास्ता न पता होने पर हमने एक लड़के से रास्ता पूछा और साथ ही कि यहाँ खाना कहा मिल सकता है, उस लड़के ने तुरंत फोन निकाल कर उसके किसी दोस्त को फोन किया उससे किसी होटल का नंबर मांगा और हमे दिया और कहा यहाँ से आप ऑर्डर कर दीजिये आपको यही देने आ जाएगा, फिर तो मुझे अपनी सोच पर संदेह हुआ, और मेरा विश्वास जाग गया। दूसरे दिन जब हम घूमने निकले तो मेरी सहेली जल्दबाज़ी में अपना फोन और चश्मा एटीएम पर ही छोड़ आई, फोन का खो जाने का दर्द मुझसे बेहतर कोई नही जान सकता, मेरे तीन फोन खोये है या कह ले चोरी हुये है। तो अब फोन का चला जाना मतलब उसके आने की कोई उम्मीद नही। फिर भी हमने सोचा चलो एक बार कॉल कर लिया जाए तो कॉल करने पर वहाँ से एक पुलिस वाले ने फोन उठाकर कहा कि आप फला जगह आकर फोन ले ले। हमे फोन और चश्मा दोनों मिल गया। फोन किसी ने एटीएम मशीन से उठाकर बगल के पुलिस स्टेशन में जमा कर दिया था। जहां एक ओर चोर पुलिस के साथ मिलकर चोरियाँ करती है वहाँ ईमानदारी का ये अच्छा उदाहरण है। अब तो मेरा विश्वास और मजबूत हो गया। फिर जब वापिसी के लिए हमने टैक्सी की तो उसने 600 रूपय बताए, हम मान गए क्योंकि हमे जल्दी भी थी और रास्ता दूर भी था। लेकिन वो टैक्सी वाले भैया (यूपी में हम भैया ही कहते है) ने न जाने कौन सा शॉर्ट कट लिया और 10 मिनट से भी कम समय में हमे हमारी मंजिल पहुचा दिया, मन ही मन इतना ठगा हुआ महसूस किया। विश्वास थोड़ा डगमगाया लेकिन सार यही निकला कि भाई हर जगह हर तरह के लोग होते है, और शायद तभी दुनिया चल रही है।

Monday, January 28, 2019

बहुत अंतर है

बहुत अंतर है कल के आज के और कल के भारत में
कल जब हम साथ बैठते थे, तो बातें होती थी आपस की, कुछ हमारी कुछ आपकी।
आज के दौर में हम बैठते जरूर हैं लेकिन जिद होती है खुद की सुनाने की, अब कल का दौर और ही होगा जब बैठके होंगी सिर्फ दिखावे की।

कल जब हमारी किसी से लड़ाई होती थी, तो आ जाते थे आसपास के लोग, झगड़ा सुलझाने को
आज लड़ाइयाँ कराई ही जाती है आसपास के लोगों के द्वारा
फिर एक कल होगा, जब परवाह नहीं होगी किसी को किसी के मरने की।

कल जहां लड़ाइयों के मुद्दे थे शिक्षा, आज़ादी, बेरोजगारी
वही आज हम मंदिर मस्जिद में ही सिमटे हुये हैं
और एक कल होगा जब लड़ाई ही मुद्दा होगा।

कल त्योहारों में एक मिठास थी अपनेपन की
आज वो कड़वाहट में बदल गई और एक कल होगा जब किस्से सुने जाएंगे किसी सोशल मीडिया प्लैटफ़ार्म पर कि, एक था त्योहार होली का।

कल जहां सब दोस्त थे, किसी अनजाने को भी हम अपना बनाकर शरण देते थे,
आज दोस्त ही अजनबी हो गए है, ईर्ष्या द्वेष ने सबको अलग कर दिया है
और एक कल होगा, जब दोस्ती के नाम पर सोशल मीडिया का फैला हुआ जाल होगा,
जहां मन का द्वेष भी एक लाइक तो कर ही देगा।

बदलाव प्रकृति का नियम है तो क्या हुआ, कि बदलते भारत में प्रकृति ही न रहे, न सुनाई दे वो दर्द की आवाज़ जो एक मासूम सी बच्ची ने दी होगी जब वो फसी होगी किसी दरिन्दे के पंजों में,
तो क्या हुआ अगर मिल जाएंगे और भारत के भविष्य चौराहों पर हाथ फैलाये हुये, तो क्या हुआ गर और बढ़ जाएगा ऊंच नीच का फासला, क्या हुआ गर सैकड़ों बेरोजगार भीड़ बनकर मार देंगे किसी एक और निहत्थे को धर्म के नाम पर।


अब बदलना तो है ही, तो फिर बदलने दो आज, कल और कल के भारत को।

Monday, July 23, 2018

कायर हो तुम #KayarHoTum

कायर हो तुम
जो देख नहीं सकते किसी को आगे बढ़ता
कायर हो तुम
जो नहीं चाहते ऐसे हालात से उबरना
कायर हो तुम
जो अपनी चीजों के लिए औरों पर इल्जामात रखते हो
कायर हो तुम
जब बात खुद पर आती हैं तो लाखों सवालत करते हो
कायर हो तुम
जो दिखता नहीं तुम्हें अपने आगे कोई
कायर हो तुम
जब बुज़दिली में तुम्हें सूझे न कुछ भी
कायर हो तुम
जब शराब के नशे में सारे जज़्बात जागते हैं
कायर हो तुम
जो अपनी जिम्मेदारियों से बार बार भागते हो।
कायर हो तुम


"जब अपने फर्ज़ की जगह
वो हर चीज जिसको तुम सिर्फ किसी कमजोर पर अपनी शक्ति दिखाने के लिए करते हो तो समझ लो"
"कायर हो तुम"

Thursday, October 12, 2017

औरतें किसी की बापौती नहीं हैं....

ख़ुद एक महिला होने के कारण शायद आप मुझे महिलाओं की हिमायती या कुछ और समझे, मुझे कोई समस्या नहीं है। क्यूंकि जिस लेवल का महिलाएं घरेलु मानसिक और शारीरिक अत्याचार सह रही हैं, उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में रेप से सम्बंधित एक कानून लाया है, जिसमें 18 साल से कम उम्र की लड़की चाहे वो शादी शुदा ही क्यों न हो, उसके साथ किया शारीरक सम्बन्ध रेप ही माना जायेगा। भाई फ़ैसला तो क़ाबिले तारीफ़ है, क्यूंकि जल्दी शादी करने को लेकर समस्या ही यही थी। कुछ माता पिता तो आर्थिक तंगी से, लेकिन कुछ बस इसलिए अपनी बेटियों की शादी जल्दी कर देते थे, कि कहीं उनके साथ कुछ बुरा न हो जाये या वो किसी के साथ प्रेम में न पड़ जायें। बस उनकी शादी करा दी जाये, फिर चाहे शादी के बाद उनका पति उनके साथ जो भी करे, सब जायज़। सिर्फ शादी किसी को भी हक़ दे देती है, कि औरत तो उनकी बापौती है।

पिछले दिनों मेरे सामने दो बाते आई, एक तो मैंने अपनी एक सीनियर का लेख पढ़ा जिसमें उन्होंने एक महिला के बारे में बताया, कि उस महिला की कम उम्र में शादी कर दी जाती है। और शादी की पहली रात उसका पति उसके साथ इतनी बुरी तरह से सेक्स करता है, कि उस महिला के मुँह से फैना आ जाता है और वो बेहोश हो जाती है। उसका पूरा बिस्तर खून से लथपथ हो जाता है। ये लाइन पढ़कर मेरे पूरे शरीर में एक कौंध सी दौड़ गई। मेरे दिमाग में बस यही था की क्या बीती होगी उस महिला पर, वो अचानक से तो बेहोश हुई नहीं होगी, कितना भयानक मंजर होगा उस महिला के लिए। ये उसके साथ एक बार नहीं कई बार हुआ और इतना सबकुछ होने के बाद भी हर रात वो ये झेलती थी। शादी के काफी सालों बाद जब उस महिला से पूछा गया कि अभी आप उस समय के बारें में क्या महसूस करती हो, तो उनका जवाब था, क्या करे मैडम जी मर्द तो ऐसे ही होते है, उन्हें तो हक़ जमाना ऐसे ही आता है। वाकई! सिर्फ़ मर्दों का हक़! औरतों का हक़ कहाँ है भाई?

ये सिर्फ एक महिला की कहानी नहीं है। क्यूंकि जो दूसरी बात मैंने जानी वो ये है, कि हाल ही में मैंने वर्ल्ड बैंक की SDGs (Sustainable Development Goals) के ऊपर एक रिपोर्ट पढ़ी, जिसमें एक सर्वे से ये पता चला है की विश्व में 40% महिलाओं को ये हक़ तक नहीं है कि वो कब गर्भ धारण करना चाहती है और कब नहीं। साथ ही वो अपने स्वास्थ्य सम्बन्धी फैसले भी खुद से नहीं ले सकती। ऐसे तो भारत में अभी भी महिलाओं को बहुत से फैसले लेने का हक़ नहीं है। लेकिन कम से कम ये हक़ तो होना चाहिए कि कब वो सेक्सुअली कम्फ़र्टेबल है और कब नहीं। सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला शायद उन लोगों के लिए मददगार होगा, जो इसके लिए आवाज़ उठाएंगे। क्यूंकि कब से हमारे यहां बाल विवाह पर कानून है। इसके बावजूद बाल विवाह आज भी हमारे समाज में है। मैं तो उन सब बच्चियों, लड़कियों, महिलाओं को बस इतना कहना चाहूंगी, कि कानून हमारा सहारा, हमारा हथियार बन सकते है। लेकिन उनको चलाना हमें ही हैं। तो अपने अधिकारों को पहचानकर जो जैसा है वैसे में मत रहिये। आपको भी उतना ही हक़ है जितना बाकि सभी को। 

Wednesday, September 6, 2017

औरत ही #Female

वो घन्टों तक चलती है लाने को थोड़ा सा पानी,
बुझा सके जिससे वो अपनों की प्यास.
वो छोड़ देती है घर अपना, 
निभाने को जिम्मेदारियां परिवार की.
बिनती है टुकड़ा टुकड़ा बनाने को फिर से एक नया घर, 
जो उजड़ा था पिछली रात को,
थकती नहीं है कभी वो अपनी जिम्मेदारियों से.
क्या बनाओगे उसे, 
वो दाता भी है, दासी भी, 
नेता भी है  और सेवक भी.
वो कोई और नहीं, है औरत ही.

Tuesday, August 1, 2017

एक #Click की कीमत तुम क्या जानो #Viewer बाबू...

अब कीमत किसकी है और ये कीमत लगा कौन रहा है और उसका फल कौन पा रहा है. इसका आकलन करना थोड़ा मुश्किल है. क्योंकि आजकी इस इन्टरनेटीय नुमाइश में हर किसी को इंतजार है तो बस एक क्लिक का. फिर चाहे उसके लिए फूहड़ता की कोई भी हदें पार करनी पड़े या मनोरंजन के नाम पर कुछ भी परोसा जाये, इससे किसी को कोई मतलब नहीं.

एक समय था जब लोग कला के कद्रदान थे, और कलाकार भी ऐसे कि बस वाहवाही के भूखे. ऐसे ही दौर ने न जाने कितने कलाकारों को जन्म दिया है. ऐसा नहीं है कि आज कलाकारों की कमी है. आज भी एक से बढ़कर एक कलाकार पैदा हो रहे है. लेकिन इन सब के बीच कुछ बरसाती मेढ़क ऐसे आ जाते है, जो कला के मायने ही बदल देते है. वैसे आज के इस दौर में सब कुछ डिजिटिलाइजेशन पर ही चल रहा है. यहाँ तक कि कला की ये परख भी. बस एक क्लिक की दौड़ में हमारे कलाकार भाग रहे है. कैसे भी करके एक क्लिक मिल जाये बस. अगर सब्सक्रिप्शन हो जाये तो शायद उन्हें रात भर नींद ही न आये. उनके हुनर को पहचान तभी मिलेगी जब उनके फोलोवेर्स सोशल मीडिया पर ज्यादा होंगे. इस भीड़ का हिस्सा न जाने कितने लोग बनते जा रहे है.

पहले के कलाकार कहते है कि हमारे समय पर ये सब नहीं था. रेडियो टेलीविज़न, समाचार पत्रों के ज़रिये उन्हें पहचान मिल जाती थी. उनका यही हुनर उनकी पहचान को बनाये रखता था. उनके अनुसार पहले बहुत ज्यादा मशक्कत करनी पड़ती थी किसी भी काम के लिए. जबकि आज का दौर अलग है एक क्लिक से इन्सान रात भर में फेमस हो जाता है. लेकिन अब भला उन्हें कौन समझाए कि ये एक क्लिक पाने के लिए लोग क्या क्या करने को तैयार हो गये है. मुझे तो ये लगता है शायद लोगों ने अपना दिमाग कहीं ख़ुफ़िया तिजोरी में छुपा कर रख दिया है. सोचा ऐसे ही काम चल रहा है तो इसकी क्या जरुरत. वैसे वाकई हमने अपना दिमाग कहीं छुपा दिया है क्या? क्योंकि मनोरंजन के नाम पर जो  मार्केट में आ रहा है, और उसे हम खुले हाथों से ले रहे है, तो कहीं न कहीं कुछ न कुछ झोल जरुर है. 

वैसे फेसबुक पे भी अब विडियो पोस्ट का इतना हुजूम फ़ैला है की पूछो मत. पहले तो इतने लम्बे लम्बे पोस्ट शेयर किये जाते थे. लेकिन जब लगा कि इन पोस्ट को पढने के लिए लोगों के पास समय ही नहीं है. तो जन्म हुआ विडियो स्टोरीज का. फेसबुक से लेकर इन्स्टा, ट्विटर भर गया इन वीडियोज से. लेकिन अब लगता है लोगों का  इन बेफिजूल वीडियोज से भी मन भरता जा रहा है. ऐसे में कुछ हुनरबाजों के लिए ये दिक्कत आ गई कि अब वो कैसे अपने हुनर को दिखाए? शायद मैंने ही अभी नोटिस किया हो कि अब हर वो दूसरा आदमी जो अपने आप को हुनारबाज मानता है, अपने विडियो के ऊपर लिखता है कृपया आखिरी तक देखे. या कई तरीकों से ये बात मनवाता कि आप आखिरी तक देखोगे तो ही मज़ा आयेगा या आप इस कहानी को तभी समझ पाओगे. सच में प्रतिस्पर्धा की इस दौड़ ने एक तरफ तो बस एक क्लिक के ज़रिये धिन्चक पूजा जैसे (उनके ख़ुद की जुबानी) कलाकारों को पैदा किया है. वही किरण यादव जैसे लोगों के फोलोवेर्स बढ़ाये है. सच में साइबर की इस बढ़ती दुनिया में एक अलग ही किस्म का मनोरंजन पैदा हो रहा है. जहाँ ये फ़र्क करना मुश्किल है कि क्लिक करके आप एंटरटेन हो रहे हो या किसी के क्लिक बढ़ाके उसे एंटरटेन कर रहे हो.

Monday, July 31, 2017

#savehumanity कोई भी जंग कभी मुबारक नहीं होती

भारत को आज़ादी गुलामी से परेशान लोगों  ने दिलवायी थी, कोई हिन्दू या मुसलमान ने नहीं... तो ज़ितना ये देश हिन्दुओ का हैं उतना ही मुसलमानो का. कहां से लोगों के अन्दर इतनी क्रूरता आ रही हैं.. क्या हैं ये?? 
मुसलमान होना गुनाह है क्या??? हलक से निबाला कैसे ऊतरा होगा उन लोगों के ज़िनके हाथ एक बच्चे को मारने से पहले कापे नहीं. 
गाय गाय गाय बस हर तरफ सिर्फ गाय... ये साला इतना ही प्यार हैं गायों के प्रति तो आज इतनी सारी गाय रोड पर घूमती क्यूँ नजर आती हैं. ज़ितने लोग भीड बनके किसी को मारके चले जाते हैं अगर उतने लोग ही गायों को पाल ले तो कुछ गायों की वजह से कोई और धर्म की बली नहीं चढ़ेगा. किसी को ट्रफेक में भीख मांगते बच्चे क्यूँ नहीं दिखते? किसी को क्यूँ नहीं सुनाई देती किसी लड़की की चीखे जब उसके साथ रेप होता हैं? क्यूँ नहीं मिटाता कोई ऊँच नीच का फासला? कब तक हम एक दूसरे को नोचते रहेंगे? क्यूँ नहीं समझ आता लोगों को हिंसा हर बात का सुधार नहीं हैं? ऐसा करके हम एक नये ग्रह युद्ध को बढावा दे रहे हैं और कमलेश्वर जी ने अपनी किताब 'कितने पाकिस्तान' में कहा हैं कि "कोई भी जंग कभी मुबारक नहीं होती" #savehumanity #violenceagainsthumanity #liveyourlife

Tuesday, January 10, 2017

महिलाओं की इज्जत को उनकी योनी में किसने रखा? #Kamla_Bhasin


वैसे तो महिलाओं की सुरक्षा आज के समय में सबसे अहम् मुद्दा है. लोग इसके बारें में खुलके बात करते हैं. हम महिलओं को कैसे सुरक्षित रख सकते है इसके तरीके बताते है. महिलओं को अपनी सुरक्षा को लेकर क्या क्या करना चाहिए ये भी बताते है. हमारे इस बुद्धिजीवी समाज में न जाने ऐसे कितने लोग मिल जायेंगे. लेकिन बंगलौर में घटित घटना सबकी असलियत को उजागर करती एक तस्वीर है. ये तो उस जगह की बात है जो बुद्दिजीवी के क्षेत्र में अपना एक स्थान रखता है. अब सोचिये न जाने कितनी ऐसी जगह हैं जो हर तरह से पिछड़ी है ऐसे में वहां क्या हो रहा है इसकी तो किसी को खबर तक नहीं है. न ही उनकी आवाज को कोई चेहरा मिल पा रहा है. ऐसे में इसका मापन कैसे हो. 

लाहौर में अभी हाल ही में पंजाब सेफ सिटीज अथॉरिटी और पंजाब कमीशन ऑन द स्टेटस ऑफ़ वोमेन ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक एप्प बनाई जिसमें वो ये भी अंकित कर सकती है कि कौन सी जगह उनके लिए खतरनाक है. चलो ये तो लाहौर की बात रही. लेकिन फिर भी, है तो महिलओं की सुरक्षा को लेकर. वैसे मेरी बात का तात्पर्य यही है कि जब इतनी बातें, सेमिनार, वर्कशॉप होते है. यहाँ तक की महिलाओं की सुरक्षा कैसे की जाये इस पर डिबेट भी होता है. फिर भी परिणाम स्वरुप हमारे हाथ में लगता क्या है? अब जब एप्प ऐसी बनाई जा रही है, जिसमे हम जगह अंकित कर सकते है कि कौन सी खतरनाक है. तो बात यहाँ ये उठती है. कि वो जगह खतरनाक क्यों है? और अगर इतनी खतरनाक है तो महिलाओं को वहां जाने की जरुरत क्या है? तो किसी एप्प में अगर ये बात आ गई है कि जगह कौन सी खतरनाक है. तो ऐसे में उन जगहों का ब्यौरा बनाकर वो क्यों खतरनाक है इस पर कार्य करना चाहिए. 

ये तो रही एक बात. अब बात दूसरी ये है कि हम कितना भी अपनी महिलाओं के लिए सुरक्षा मुहैया करा दे. लेकिन उनके खिलाफ़ वारदात कम नहीं होती. ऐसे में बात ये सामने आती हैं कि कोई भी हेल्पिंग नंबर और एप्प तब तक कार्य नहीं करेगा जब तक हम एक निश्चित सजा निर्धारित नहीं करते. और सजा के साथ एक समय सीमा भी. क्योंकि जो मैंने देखा है पिछले दिनों में वो ये है कि अब हमलावरों के अन्दर डर नहीं रहा हैं किसी भी घटना को करने से पहले वो परिणामों के बारें में नहीं सोचते. अब उनके अन्दर एक अजीब सी बेचैनी है जो उनके सोचने समझने की शक्ति को उस पल के लिए खत्म कर देती है. दूसरी बात की उनकी परवरिश किस माहौल में हुई है. जहाँ उनके अन्दर किसी भी चीज के लिए सोचने समझने की शक्ति उत्पन्न नहीं होती. व कुछ ऐसी सोच वाले भी होते है जिनके लिए महिला सिर्फ उपभोग की वस्तु है. उससे अधिक अगर उसने कदम बढ़ाएं तो उसके कदम को वही कुचल दिया जाता है. हमें आज महिलाओं के लिए सुरक्षित समाज से ज्यादा जो पीड़ित महिलाएं है उनके लिये एक बेहतर समाज बनाने की जरुरत है. क्योंकि हमेशा घर से निकलने से पहले उनके मन में ये ख्याल तो आता ही है कि कही कुछ हो गया तो. लेकिन उससे भी अधिक डर उन्हें ये विचार करता है कि वो किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं बचेंगी. व समाज उनके बारें में क्या सोचेगा. तो डर उन्हे घटना का नहीं बल्कि घटना के बाद के परिणामों का हैं. जो हम उन्हें देते है. 

अपराधी तो अपराध करके चला जाता है. लेकिन उसके अपराध की सजा हम महिलाओं को देते है. सबसे पहला जो विचार आता है कि उसकी इज्जत लुट गई. तो यहां मुझे 'कमला भसीन' जी की एक बात याद आती है कि महिलाओं की इज्ज़त को उनकी योनि में किसने रखा। इज्जत का मतलब क्या होता हैं?  जबकि इज्ज़त से ज़्यादा उसके आत्मसम्मान के बारें में कोई बात क्यों नहीं करता,  कोई उसकी इच्छा के विरुद्ध जो अपराध हुआ है उसके बारें में बात क्यों नहीं करता, कोई ये बात क्यों नहीं करता कि उस पीड़िता को कैसे समाज में सम्मान से रहने दिया जाये. अगर हम ऐसा समाज बनाने में सफल हो गये, जहाँ दोषी को दोषी ही माना जाये, पीड़िता को सम्मान से जीने दिया जाये. तो महिलाओं के अन्दर ये डर कि समाज क्या सोचेगा नहीं रहेगा. और दोषियों की प्रवत्ति, की इनको सबक सिखाना चाहिए वो भी कम होगी. और शायद सम्मान के साथ महिलाओं के अन्दर इन अपराधों से लड़ने की ताकत आ जाये. और उनकी इस ताकत को देखकर अपराधी अपराध करने से पहले १० बार सोचें. क्योंकि महिलाएं सशक्त हैं. वो अपना अच्छा बुरा अच्छे से जानती है. बस उनके इस सशक्तिकरण को समाज में जगह दिलवानी हैं. ये सब कुछ कल्पनायें है जो किसी किसी के समझ से तो परे है क्योंकि अब हमारी प्रवत्ति सोचने समझने से हटकर हमलावर हो गई है. वो कहते है न डूबते को तिनके का सहारा और एक चिंगारी आग लगा देती है. बस अब हम यही कर रहे है. तिनका मिलता नहीं और चिंगारियां तो आये दिन आग लगाती रहती है.

Monday, October 10, 2016

#Blue_Shirt

यात्रीगण ध्यान दे वैशाली की ओर जाने वाली गाड़ी प्लेटफार्म नंबर २ पर आ रही है.

ओहो गाड़ी भी आ गई. लड़कियों के लिए लगी लम्बी कतार में मेट्रो परिसर में अपनी एंट्री का इंतज़ार करती हुई सनाया आज 5 मिनट लेट उठने पर अफ़सोस जता रही थी. काश मैं 5 मिनट पहले उठ गई होती तो मुझे ये मेट्रो मिल जाती.
अब मै 5 मिनट देरी से ऑफिस पहुँच पाऊँगी और 5 मिनट की देरी पर वो राक्षण मेरा सिर खा जायेगा. नरक हो गई है जिंदगी यहाँ. क्या सोचके के घर से निकली थी कि बड़े शहर में हज़ार मौके मिलेंगे. 4 साल इंजीनियरिंग की पढाई का कुछ तो फल मिलेगा. आखिर कार टोपर थी मैं. लेकिन यहाँ आके जिंदगी क्या हो गई है. करने के लिये तो कोई काम बुरा नहीं हैं, लेकिन मैं कब तक इसमें अपना टाइम बर्बाद करूंगी. 9:30 से 6:30 बजे तक वाली जिंदगी मैं ज्यादा दिन तक नहीं झेल सकती. और इस बड़े से शहर में कोई नहीं हैं मेरी ये बातें सुनने वाला.

और तभी मैडम मैडम आपका बैग मेट्रो चेकिंग के अन्दर खड़ी महिला कांस्टेबल सनाया को उसकी हताशा से भरे ख्यालों से निकाल देती है.

सनाया उसे शक की नजरों से देखती है और अंदाजा लगाती है कि उसने अभी क्या बोला.

फिर वो कांस्टेबल अरे मैडम अपना बैग मशीन में रखकर आइये.

ओह्ह्ह सॉरी. अपनी बेवकूफकाना हरकत पर सनाया को थोड़ी सी शर्मिंदगी होती है फिर वो बाहर आकर बैग चेकिंग वाली मशीन में अपना बैग रखती है फिर खुद सेल्फ चेकिंग वाले एरिया से निकल कर जैसे ही अपना बैग उठाती है उसी के साथ ही वो झटके से बैग उठाने के चक्कर में  किसी और का बैग गिरा देती है.

ओह्ह्ह आई ऍम सो सॉरी.

इट्स ओहक सामने खड़ा एक नौजवान शालीनिता भरी मुस्कान के साथ बोलता है.

सनाया उसकी मुस्कान को अनदेखा सा करके अपनी ट्रेन पकड़ने के लिए चली जाती है.

जैसे ही मेट्रो आती है सनाया पीछे मुड़कर देखती है तो वही लड़का उसके पीछे खड़ा होता है. मेट्रो के गेट के खुलते ही दोनों अन्दर प्रवेश कर लेते है, सनाया बड़े स्टाइल में अपना फ़ोन निकालती है और इअरफ़ोन लगाकर गाने सुनने लगती है. जैसे ही उसका स्टेशन आने वाला होता है. तो मेट्रो के शीशे से वो देखती है कि वही लड़का उसके पीछे खड़ा है. सनाया मन ही मन में सोचती है कि अब क्या ये मेरे साथ उतरेगा भी.

और होता भी वैसा ही है. सनाया की तरह वो लड़का भी उसी स्टेशन पर उतरता है. फिर एग्जिट गेट की लाइन से लेकर मेट्रो स्टेशन के बाहर तक वो लड़का सनाया के पीछे पीछे ही चलता है. अब इसे संजोग कहे या किस्मत. कि जिस शेयरिंग टैक्सी में सनाया बैठती है. वो लड़का भी उसी टैक्सी में बैठता है. अब तो सनाया का गुस्सा बढता ही जा रहा था. मन में न जाने कितने ख्याल आ रहे थे. और तो और थोड़ी थोड़ी देर में न चाहते हुए भी सनाया की नज़र उसकी ओर चली जाती थी, और जैसे ही वो लड़का सनाया की ओर देखता. सनाया ठिठक के अपना मुंह फेर लेती. मतलब अब ये मुझे ताड़ भी रहा है, अगर ये मेरे साथ ही उतरा तो फिर तो मै इसे सबक सिखा ही दूंगी. सनाया न जाने कितने ऊल जलूल ख्याल अपने मन में ला रही थी. तभी उसके कानों ने एक आवाज़ सुनी, जो उसी लड़के की थी- भैया बस आईटी चौराहे पर रोक दीजियेगा. फिर टैक्सी रूकती है और वो लड़का उतरकर चला जाता है.

अब तो सनाया को और भी गुस्सा आने लगा, लेकिन इस बार ख़ुद पे. तुम समझती क्या हो सनाया ख़ुद को, कहीं की हूर हो, कि हर लड़का तुम्हारे पीछे ही आयेगा. एक तो तुमने उसका बैग गिराया ऊपर से इतनी देर से उसके बारे में न जाने क्या क्या सोच रही हो. हद होती है किसी चीज की. सच में अब तो कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा. दिमाग ख़राब होता जा रहा है मेरा.
तभी टैक्सी वाले भैया. मैडम बासठ आ गया.

दूसरे दिन सनाया उसी जल्दबाजी के साथ मेट्रो स्टेशन की सीडियाँ चढ़ रही थी. ओहो आज फिर पांच मिनट लेट हो गयी यार. फिर से ये वाली मेट्रो मिस हो जाएगी. जल्दी जल्दी चेकिंग एरिया पार करके सनाया प्लेटफार्म पर पहुचती है तो देखती है कि वही लड़का प्लेटफार्म पर पहले से ही खड़ा है. वही ब्लू शर्ट में. उसे देखते ही सनाया ने अपनी नजरे चुराई और एक ओर देखने लगी. ट्रेन आई और दोनों उसमे सवार होके अपनी अपनी मंजिल को चल दिए.
सनाया को हर रोज वो लड़का मेट्रो स्टेशन पर मिलता, कही एंट्री के टाइम या प्लेटफार्म पर या फिर एग्जिट के समय. लेकिन मिलता ज़रूर था. और उसी ब्लू शर्ट में. शायद उसके ऑफिस की ड्रेस हो. सनाया अक्सर उसे देखके यही सोचती.

कभी कभी तो एग्जिट करते टाइम अगर सनाया पीछे खड़ी हो तो वो सनाया को पहले एग्जिट करने के लिये ऑफर करता. और तो और टैक्सी में भी सनाया को आता देख वो साइड में खिसक जाता और सनाया को सीट ऑफर करता.

बिना बोले ही सनाया को ऐसे लगता कि जाने कितनी बात कर ली हो उससे. सनाया को भी अब आदत सी हो गई थी उसकी. और अब तो बिना बडबडाये हर रोज जानबूझकर पांच मिनट लेट निकलती थी. आखिरकार मेट्रो की हर रोज की बदलती भीड़ में एक चेहरा जो मिल गया था. वो ब्लू शर्ट.

बस फिर क्या दो तीन महीनें तक यही सिलसिला चलता रहा. न उसने कुछ बोला और न ही सनाया ने. बस वो 8:20 वाली मेट्रो उनका पत्ता थी. और उस आईटी चौराहे तक का उनका सफ़र. अब सनाया भी कोशिश करती थी कि वो उसी टैक्सी में आके बैठे. इसीलिए जानबूझकर वो टैक्सी के दूसरी साइड नहीं खिसकती थी. जैसे ही वो ब्लू शर्ट वाला लड़का आता तो वो खिसक के उसे जगह देती. ये सिलसिला यूँही चलता जा रहा था.

फिर एक दिन हर रोज की तरह सनाया अपना मेल बॉक्स चेक कर रही थी. तभी वो देखती है कि उसकी मेल लिस्ट में congratulation का एक मेल होता. जैसे ही सनाया उसे खोलती है तो उसकी आँखे खुली की खुली रह जाती है. ओह माय गॉड मेरा सिलेक्शन लैटर आ गया. वो तुरंत अपना फोन उठाती है. और अपने घर पर फोन लगाती है.

हेलो मम्मी, मम्मी मेरा सिलेक्शन हो गया एक बहुत बड़ी आईटी कंपनी में. जिसके लिये मैंने पिछले महीने written दिया था. जिस दिन का मुझे इतना इंतजार था वो दिन आ गया मम्मी. मंडे बुलाया है. सारी formalities के बाद. next डे से ही जोइनिंग हैं.

अपनी ख़ुशी सबमे बाँट कर सनाया जब बैड पर लेटी हुई ऊपर की ओर देख रही थी, तभी उसे एहसास होता है. कि इस नयी नौकरी के साथ सब बदल जायेगा. उसका ऑफिस, आसपास के लोग, वो ऑफिस के बाहर टपरी वाली चाय, और वो 8:20 वाली मेट्रो. अचानक से ही सनाया की सारी खुशियों में जैसे ग्रहण लग गया. और वो बेचैन होने लगी.  


पूरी रात वो बस यही सोचती रही. कि अब वो क्या करेगी. मुझे तो ये भी नहीं पता की क्या मैं उसे पसंद करती हूँ. अगर वो न करता हो तो. हमारे बीच जो चल रहा है वो बस एक दूसरे का बहम हो. और मै उससे बोलूंगी क्या, किस हक़ से बोलूंगी कि मैं अब से इस रास्ते नहीं आऊँगी. कि अब से हमारे रास्ते अलग हो जायेंगे. और शायद अब हम कभी न मिल पाए. या फिर कम से कम उसका नाम ही पूंछ लूंगी. अपने मन और दिमाग की लड़ाई में सनाया ने पूरी रात गुजार दी. 

सुबह जल्दी उठके बिना कुछ सोचे वो निकल पड़ी उस 8:20 की मेट्रो के लिए. एंट्री गेट से लेकर प्लेटफार्म तक सनाया की नजरे बस एक ही चीज ढूढ रही थी. वो ब्लू शर्ट. ब्लू शर्ट तो बहुत मिली लेकिन वो वाली नहीं जिसका सनाया को इंतजार था. एग्जिट के टाइम भी सनाया ने बहुत कोशिश की. कि कहीं से वो उसे दिख जाये लेकिन उसका कहीं पता नहीं था. थक हार के सनाया टैक्सी स्टैंड पर पड़ी चेयर पर बैठ गई. और सोचने लगी अब क्या होगा कैसे उसे मैं ढूढूगी. मुझे तो उसका नाम तक नहीं पता. बस एक ही चीज हैं उसकी जो मुझे याद है. बस उसकी वो ब्लू शर्ट. 

Thursday, October 6, 2016

आँखे बंद जब की मैंने

आँखे बंद जब की मैंने, तो तेरी परछाई का एहसास हुआ, खोलते ही गुम गया तू, तब मुझे ये एहसास हुआ, कि तू है कहीं आसपास मेरे, साया तेरा मुझमें ही हैं. रखती हूँ कदम जहाँ भी, छाया तेरी मुझपे ही हैं. जब जब ये धड़कन बढ़ती है, तेरी ही नज़र का जादू है जो साथ साथ चलती है. हर चेहरे में जब तेरा चेहरा ढूढती हूँ. मचल उठती हूँ मैं जब उनमें तुझे न पाती हूँ. कहा हो तुम कैसे हो तुम, बस ये ख्याल अब दिल को सताता हैं, मिल पाऊँगी कभी क्या मै तुमसे, बस ये फिक्र मुझे जलाती है. कुछ न बाकी है अब हमदम, अब तुझसे बस मिलना है. कहाँ हैं तू कैसा हैं तू बस ये अब मुझको सुनना है. जबतक साँसे चल रही है तब तक तुझसे मिलने कि आस है. तो क्या मिलोगे तुम बस एक बार चाहे आखिरी बार.

Wednesday, September 28, 2016

#Equality - हम सब एक है....

हैं कौन देश का वासी तू,
और क्या तेरी जात है,
हिन्दू है या मुस्लिम है तू,
अरे क्या तेरी पहचान है,
है क्या तू इसी दुनिया का,
या अलग ही तेरा जहान है,
देखा मैंने जहाँ जहाँ 
तू मिल जाता है वहां वहां,
लिए हाथ में खंजर सीने में पत्थर
मन द्वेष आखों में नफ़रत,
है किसकी तुझे तलाश है,
क्यों ये इतना वैर है और 
क्यों ये खून की प्यास है,
क्या भूल गया कि इंसान है तू,
तुझसे ही ये धरती आसमान है,
मिलके बनाते हो तुम ही घरोंदे ,
फिर क्यों उसको खुद ही उजाड़ने के ख्याल है,
नहीं समझ सकता मैं इस सत्ता को,
जहाँ एक हाथ में हथियार दुसरे में गीता कुरान है.

Monday, August 15, 2016

ऐ माँ....

है कुछ किस्से यादों की लोरी में,
आधे तेरे आधे मेरे,
चलना है साथ बस यू ही,
चाहे सांज हो या सबेरे,
तेरे आंचल के साये में,
संभले है हालात मेरे,
दूर हूँ  अभी तो क्या ऐ माँ...
नजरों की दूरी बाँट न सकती प्यार को तेरे......

Tuesday, May 24, 2016

आईना

आईना.......


मंगलम भगवान् विष्णु मंगलम गरुद्द्वाज,
मंगलम पुण्डरीकक्षाय मंगलाये तनोहरी......
वर वधु फेरों के लिए खड़े हो जाइये,
राज बेटा पंडित जी कुछ कह रहे है, राज सुन रहा है न तू..
राज यार क्या हुआ???
अपने दोस्त राहुल की आवाज सुनकर राज अपने ख्याल से बाहर आता है.
क्या कर रहा है यार दिन में सपनें, अभी ऑफिस खत्म होने में टाइम है सो गेट उप, क्या हुआ कोई दिक्कत. अगर है तो इसको तू ही सोल्व कर सकता है, राहुल बड़े ही मजाकिया अंदाज में बोलता है. अपनी ही दुनिया में मगन राज बस ह्म्म्म का जवाब देकर फिर सोचने लगता है. कि आज वो कहाँ आकर खड़ा हो गया है. ऐसी जगह जहाँ उसे कुछ समझ नहीं आ रहा. सोचते सोचते वो राहुल से बोलता है कि अब मैं सब खत्म करने की सोच रहा हूँ. इसबार पक्का मैं प्रिया को बोल दूंगा. लेकिन पिछले ५ सालों से ये बात सुनते सुनते राहुल भी ऊब गया था. उसे पता था कि मैं ऐसा कुछ नही करने वाला. राहुल की तरफ से कोई भी रिस्पांस न मिलने के कारण राज फिर सोचने लगता है.

शादी के ५ सालों बाद राज को फिर वही ख्याल आया था जब वो अपनी शादी के मंडप में बैठकर पंडित जी की बातों और शहनाइयों की आवाज से ऊपर उसे अपने मन की आवाज सुनाई दे रही थी वो सोच रहा था. क्या ये सही समय है शादी करने के लिए, मैं तो प्रिया को जानता तक नहीं, ये कोई तरीका नहीं होता की खुद फैसला कर लिया और बस बोल दिया लड़की अच्छी है. अरे लडकियाँ कौन सी ख़राब होती है, मुझसे तो पूछा होता कि मैं क्या चाहता हूँ. उस समय तो लगा कि मम्मी पापा ने कुछ सोचकर ही रिश्ता तय किया होगा. और शायद सबको शुरुआत में ऐसा ही लगता है. एक दूसरे को जानेगे तो सब ठीक हो जायेगा. लेकिन राज का ऐसा सोचना गलत था. वो आज भी उसी मजधार में फंसा है जिसमें वो शादी के टाइम फंसा था.

वैसे प्रिया कहने में सबसे बेस्ट वाइफ होगी, वो सुन्दर है, घरेलु है, अपने पति का ख्याल रखना उसे बहुत अच्छे से आता है. मेरी सारी चीजें वो बहुत अच्छे से सम्भाल के रखती है, जो है वो उतने में खुश रहती है, कभी न शिकायत, न ही डिमांड. इतने साल होने के बाद भी उसने कभी ये नहीं पूछा की मै उसके करीब क्यों नहीं आया. उसको खुश करना भी कोई मुश्किल काम नहीं. महीनें में उसके पसंद की चीजें दिलवा दो. या कुछ भी लाकर दे दो, वो ख़ुशी ख़ुशी एक्सेप्ट कर लेती है.वैसे कहने को तो हम पति पत्नी है. एक घर में रहते है, ऑफिस पार्टी में साथ साथ जाते हैं, कभी कभी साथ में शॉपिंग कर लेते है. दुनिया की नज़रों में  “अ हैप्पी मैरिड कपल”. लेकिन असल में हम एक घर में दो मशीन की तरह रहते है. जहाँ मैं पैसे कमाने में लगा रहता हूँ और वो घर सम्भालन में. प्रिया कभी मुझसे कुछ सवाल नहीं करती, मैं जितना बोलता हूँ सुन लेती है और मान भी लेती है.
मैं प्रिया से कभी प्यार नहीं कर सकता, इस चीज का एहसास मुझे शादी की पहली रात को ही पता चल गया था, और ऐसा कभी भी नहीं कर पाऊंगा, इस चीज का एहसास मुझे सोनिया से मिलने के बाद पता चला. सोनिया मेरी दोस्त है या कहे दोस्त से कुछ ज्यादा. मै अपनी ५ साल की शादी के वाबजूद एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर चला रहा हूँ सोनिया के साथ. उस लड़की के साथ जिससे मैं प्यार करता हूँ. सोनिया जितनी बोल्ड है प्र्रिया कभी वैसी हो ही नहीं सकती. एक ओर जहाँ सोनिया इतनी वायलेंट है वही प्रिया उतनी ही शांत. माना कि सोनिया मेरे ही ऑफिस में काम करती है, लेकिन सोनिया वो लड़की है जिसे मैं हमेशा अपने ख्यालों में सोचता था जिसको देखते ही मैं समझ गया था कि यही है वो लड़की जिसके लिए मैं इतने टाइम से इंतजार कर रहा था. जब वो पहले दिन ऑफिस में आई, तो हर किसी की नजर बस उसपर थी. स्काई ब्लू शर्ट के साथ स्किन टाइट ग्रे कलर स्कर्ट में किसी बॉस से कम नहीं लग रही थी. जब सर ने सारी टीम के साथ उसका इंट्रोडक्शन कराया तो सबके सब बेताब थे कि उनका नंबर कब आएगा. एक एक करके जब मेरी बारी आई तो मैं पहला था जिसको सोनिया ने खुद आगे आकर हाथ मिलाया, भाई मेरा तो दिन बन गया और बाकी सबकी शक्लें. फिर उसी दिन जब लंच पर वो मेरे साथ वाली चेयर पर आकर बैठ गई और बोली, मेरे यहाँ बैठने में आपको कोई दिक्कत तो नहीं. मेरी जवाब सुने बिना ही वो बोल पड़ी अरे आपको होगी भी नहीं यू आर नॉट दैट टाइप ऑफ़ पर्सन. मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि ये दैट टाइप ऑफ़ पर्सन क्या हुआ. मतलब मैं कोई टाइप में भी आता हूँ. खैर पूरे लंच के टाइम वो मुझे देखकर बात करे जा रही थी. और सब मुझे देखें जा रहे थे. एक ही दिन में मै सोनिया से ज्यादा नोटिस होने वाला वंदा बन गया था. शाम तक आते आते बात तो और ही बड़ गई. और वो ये की सोनिया ने मुझे गले लगाकर बाय बोला और चली गई. अब तो सच में सबकी सिगरेट के साथ उनका दिल भी जल रहा था. ऐसा नहीं है की मैं उससे बात नहीं करना चाह रहा था. लेकिन यहाँ तो बिना बात के ही बात बड़ रही थी.
उसी शाम जब मैं घर आया तो मेरे नॉक करने के पहले ही प्रिया ने दरवाजा खोल दिया. और लाल साड़ी में तैयार प्रिया किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी. मांग में सिंदूर, माथे पे बिंदी, गले में मंगलसूत्र सारी चीज़े उसके और मेरे रिश्ते को बयाँ कर रही थी. सोनिया के ख्यालों में खोया हुआ मैं एकदम से अपनी असल जिंदगी में आ गया. जहाँ मैं किसी का पति था. रोज की तरह प्रिया ने ब्रीफ़केस लिया और बोली आप फ्रेश हो जाइये, मैं खाना लगा देती हूँ. हर महीनें में एक आध बार प्रिया ऐसा जरुर करती थी. जब वो अच्छे से तैयार होकर मेरे पसंद की सारी चीजें बनाती थी. वैसे तो वो हमेशा ही मेरी पसंद का ख्याल रखती थी. लेकिन कुछ दिन ये स्पेशल ट्रीटमेंट उसकी तरफ से हमारे रिश्ते को जिंदा करने की तरकीब होती थी. जिसे मैं हमेशा ख़राब कर देता था. उसके इस रूप को देखकर कोई भी इन्सान अपने आपको उस पर लुटा सकता था. लेकिन मैं पता नहीं क्यों चाहकर भी ये नहीं कर पा रहा था. खाना खाते ही मैंने उससे बोला कि मैं थक गया हूँ. तो मैं सोने जा रहा हूँ. अपने माथे पर एक सिकन लाये बिना वो  बोली ठीक है आप सो जाइये. कभी कभी मैं खुद सोचता था कि मैं ये क्या कर रहा हूँ. क्यों अपनी बजह से किसी और को सज़ा दे रहा हूँ. इसमें प्रिया की क्या गलती. और यही बात मेरा दोस्त राहुल भी हर बार समझाता था. कि तुम्हें कोई तो फैसला लेना होगा. लेकिन हर बार मेरे सामने ये बात आ जाती थी कि मैं अपने माँ-बाप को क्या बोलूँगा, कि मैं प्रिया को किस लिये छोड़ना चाहता हूँ. यही कि वो बहुत अच्छी हैं, मेरा हमेशा ख्याल रखती है, और मैं जो कुछ भी बोलता हूँ मान लेती. वो हर एक मामले में एक अच्छी बीवी हैं. लेकिन शायद मेरी जरूरतें ही अलग है.
मैं प्रिया की मेहनत और उसके प्यार को इग्नोर करके सोनिया के ख्यालों में फिर से खो गया. कि उसने सिर्फ मुझसे हाथ मिलाया और आते वक़्त गले भी मिली. इतनी जल्दी मैं सोनिया के, या ये कहे हम दोनों एक दूसरे के इतने करीब आ जायेंगे सोचा भी नहीं था. उसका मीटिंग के बीच मुझे आँख मारना, टेबल के नीचे से मेरा हाथ दबाना. मेरे पसीने ही छुड़वा देता था. मीटिंग खत्म होने के बाद उसका मेरी हालत पर जोर जोर से हंसना और मुझे फट्टू बुलाना मुझे सबसे ज्यादा पसंद था. कभी भी कहीं भी कुछ भी बोलने वाली सोनिया हमारे प्यार में ट्विस्ट डालने के लिए हमेशा रेडी रहती थी. और उसके वो टैगलाइन- टू मिनट मैगी चाहिए या फुल डिनर. सच में उसकी इस बेबाकी वाली जिंदगी में मैं हर एक चीज भूल जाता था. सिर्फ मुझे सोनिया दिखती थी, उसकी वो हंसी, उसके वो प्रैंक. एक बार तो रात को १२ बजें मुझे कॉल करके बोला कि मेरे घर में कोई हैं. प्लीज जल्दी आ जाओ, मैं डर की वजह से भागा गया तो देखा फ्लैट का दरवाजा खुला था जब मैं अन्दर गया, तो पूछा क्या हुआ कौन था. चला गया क्या? नहीं अभी तो आया है सोनिया ने कहा.

आज मेरे और सोनिया के रिश्तें को ३ साल हो गये है.लेकिन अब भी इसमें एक नयापन हैं. बस अब मैं प्रिया से कुछ नहीं छुपाना चाहता. मैं उससे अपने हर एक किये की माफ़ी मांग लूँगा. और मुझे पूरा विश्वास है कि वो मुझे माफ़ कर देगी.
हर बार मैं ये सोचता था कि मैं अपने हिस्से की ख़ुशी क्यूँ न जियूं, लेकिन हर बार ये भूल जाता था की प्रिया की भी तो कुछ ख़ुशी होंगी. आज वाशरूम में सोनिया के साथ जब शीशें में मैंने अपने आप को देखा तो पाया कि मैं क्या हो गया हूँ. अपनी जिंदगी और अपनी ख़ुशी में इतना पागल की मुझे ख्याल तक नहीं रहा किसी और का. वो चमचमाती रौशनी में मुझे मेरा चेहरा काला नज़र आ रहा था. जिसपर खुदगर्जी और बेगैरतपन की कालिख पुती हुई थी. मैंने अपना मुंह शीशें की तरफ से मोड़ा और सीधे वाशरूम से बाहर आकर अपनी डेस्क पर बैठ गया.

आज मुझे घर जल्दी जाना होगा, अब मैं एक पल भी नहीं रुक सकता. मैं आज प्रिया को सबकुछ बता दूंगा, कि जिसके लिए वो इतना सबकुछ करती हैं वो उसका हकदार ही नहीं. फिर उसका जो फैसला हो. लेकिन अब मैं इन दो नावों पर सफ़र नहीं कर सकता. जबकि मुझे पता हैं कि मेरी नाव कौन सी है. आज मैं प्रिया को हर बोझ से आजाद कर दूंगा. इन्हीं सब बातों को सोचते हुए राज अपने घर की तरफ  निकल पड़ा.
रास्तें में भी उसे न जाने कितने ख्याल आये. वो बस सोचता रहा कि कैसे वो हर बार प्रिया और उसकी चीजों को इग्नोर कर दिया करता था. यहाँ तक कि जब ऑफिस की तरफ से नैनीताल ट्रिप प्लान हुई जिसमें हर किसी को अपने पार्टनर के साथ जाना था. वहां पर भी मैंने प्रिया को छोड़कर अकेले जाना ज्यादा सही समझा. क्योंकि दुनिया वालों की नजरों में वो मेरी पत्नी थी, लेकिन मेरी नजरों में मेरा  पार्टनर सोनिया के अलावा कोई नहीं. इसीतरह एक बार जब मेरे सारे फ्रेंड घर पर खाना खाने के लिए आये तो सब प्रिया के हाथ के खाने की तारीफ किये जा रहें थे. खुद से ज्यादा किसी और के मुंह से अपनी बीवी के खाने की तारीफ मुझे थोड़ी जलन तो जरुर दे रही थी. लेकिन मैं करता भी क्या. जलन में मैंने खाना तक नहीं खाया और मेरे चेहरे का हाल प्रिया तुरंत समझ गई.

अपने आपको प्रिया का गुनाहगार समझता हुआ राज जब अपने फ्लैट की बिल्डिंग के पार्किंग एरिया में पहुंचा तो एक जानी पहचानी गाड़ी ने थोड़ी देर के लिए उसका ध्यान खींचा. लेकिन पश्चाताप की आग में जलता हुआ राज किसी भी चीज की परवाह किये बिना लिफ्ट एरिया में गया.
सलाम साहेब आज इतनी जल्दी. लिफ्ट के चौकीदार ने परवाह जताते हुए पूछा.
१२ वीं मंजिल. राज ने उसके सवाल को नजरअंदाज करते हुए बोला.
जी साहेब.
१२ वीं मंजिल पर लिफ्ट जैसे ही रुकी राज का दिल जोर जोर से धड़कने लगा. उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. अपने फ्लैट की मंजिल पर पहुँचकर उसे थोड़ा ख्याल उस कार का आया जो उसके बिल्डिंग के पार्किंग एरिया में खड़ी हुई थी. न जाने क्यों उसका दिल और जोर जोर से धड़कने लगा. अपनी ५ साल की शादी में राज आज पहली बार घर जल्दी आया था. और अब उसे अपने ही घर में जाने से डर लग रहा था. उसने डोर वेल बजाने की जगह अपने फ्लैट के पीछे के गेट से जाना ज्यादा सही समझा. इस समय राज किसी भी सोचने समझने की हालत में नहीं था. उसे जो समझ में आ रहा था वो वही कर रहा था. अपने ही घर में चोरों की तरह घुसने में राज को भी बहुत अजीब लग रहा था.
पीछे के दरवाजें से जब राज अन्दर आया तो देखा प्रिया कहीं नहीं है, फिर वो धीरे से अपने बेडरूम की तरफ गया. बेडरूम का दरवाज़ा थोड़ा सा खुला हुआ था. जरा सी झलक देखते ही उसने तुरंत अपनी पीठ घुमा ली. उसकी आँखों ने जो देखा था उसे उसपर विश्वास नहीं हो रहा था. वो पूरी रफ्तार के साथ वापस मुड़ा और सीधे पार्किंग एरिया में खड़ी अपनी गाड़ी में आकर बैठ गया.
नहीं ये नहीं हो सकता, ये सब मेरे मन का बहम है, आज मैं कुछ ज्यादा ही ख्यालों में हूँ. राज मन ही मन बडबडाता हैं. जैसे ही वो गाड़ी के सामने की तरफ देखता है तो उसकी नज़र वही खड़ी जानी पहचानी गाड़ी पर पड़ती हैं.
ये तो राहुल की कार है. राहुल और प्रिया!!! ऐसा कैसे हो सकता हैं मेरा अपना दोस्त मेरी ही बीवी के साथ, मेरे ही घर के बेडरूम में ऐसे!! क्या राहुल इसी बजह से मुझे प्रिया को छोड़ने के लिए बोलता था.
और प्रिया!! वो तो इतनी पतिव्रता स्त्री थी, अब उसे क्या हुआ. शायद इसीलिए उसे आज दिन तक मेरे पास जाने का बुरा नहीं लगा. मेरी खुद की बीवी मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकती है. राज के मन में न जाने ऐसे कितने ख्याल आ रहे थे. तभी उसकी नजर गाड़ी के अन्दर लगे शीशें पर पड़ी. खुद की नजरों से नज़र मिलाते ही शीशें में प्रतिविम्बित राज उससे बोलता है.
क्यों तुम्हें बुरा किस बात का लग रहा हैं. यही न कि प्रिया तुम्हारी बीवी है. बस! जिसे बीवी का दर्जा तुमने आज दिन तक नहीं दिया. और अचानक से तुम्हें उसका ख्याल आ गया की वो तुम्हारी बीवी है, तो वो ऐसा कैसे कर सकती है. और जो तुम इतने सालों से उसके साथ जो व्यवहार कर रहे हो. क्या वो सही है. तुमने कौन सा अपना पति धरम निभाया है. और आज भी तुम उसे गले लगाने नहीं बल्कि ये बताने के लिए आये थे कि तुम उसे छोड़कर आजाद करना चाहते हो. और उसकी ये आज़ादी तुम्हें हजम नहीं हुई. सच मानो तो राज तुम कितने खुदगर्ज हो, माना की तुम प्रिया के साथ खुश नहीं थे तो तुमने अपनी ख़ुशी सोनिया में ढूंड ली. और प्रिया के अकेलेपन पर तुम्हें तरस तक नहीं आया. और अब जब तुम्हें पता चला कि वो किसी और के साथ हैं. तो तुम्हें जलन होने लगी. खुश रहने का हक़ सिर्फ क्या तुम्हें ही है. अपने अन्दर की आवाज़ सुनकर राज एक राहत की सांस लेता है. और गाड़ी स्टार्ट करके निकल पड़ता हैं.